जिंदगी की दौड़ में
हम बहुत पीछे छूटे हैं,
हम नहीं टूटे हैं
हमारे ख़्वाब टूटे हैं.
रोशनी के हाथों में बेड़ियां
अंधेरों ने खोले हैं यातनाघर
जी रहे विषपायी पल मानो
जीतना हो जीवन का महासमर
क्या खोया-क्या पाया
मत कहो,करम फूटे हैं,
प्रायश्चित की हवेली में
हमारे दावे झूठे हैं.
कभी न पाई मंजिल लेकिन
भटक रहे मन के बंजारे
पीड़ा के पर्वत लांघे हैं
दुःख को रेहन स्वप्न हमारे
कहना है कितना कुछ
पर बंदिश के खूंटे हैं,
समय के सिपाहियों ने
हमारे पल-छिन लूटे हैं.
***श्रवण***
No comments:
Post a Comment