Thursday, February 9, 2012

फिर उठा तूफान क्या हम आज़माना छोड़ दें

फिर उठा तूफ़ान क्या हम आज़माना छोड़ दें
बिजलियों के डर से क्योंकर घर बनाना छोड़ दें

दर्द-ए-दरिया में हमारी नाव फिर से जा फंसी
दूर है साहिल तो क्यों हम मुस्कुराना छोड़ दें

हर तरफ आतंक है छाया हुआ इस दौर में
काश! हम अंदाज़ अपना वहशियाना छोड़ दें

प्यार में गाफ़िल हुए,रुसवाइयों का डर कहाँ
क्यों भला हम इश्क में लुटना-लुटाना छोड़ दें

हमसे उनको है अदावत,उनकी मर्ज़ी,क्या करें!
कैसे हम यूँ दिल की रस्मों को निभाना छोड़ दें

अब यहाँ पर ज़िंदगी का रुख़ बदलना चाहिए
नक़ली खुशियों का यहां,आओ बहाना छोड़ दें

गर बदलना चाहते हैं आज के हालात को
हम आईनों से बेहिचक आंखें चुराना छोड़ दें
***श्रवण***

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