मरने से क्या डरना,भाई
पग-पग पर हैं बसे कसाई
अधिकारों की बात चली है
चल कर छेड़ें एक लड़ाई
संविधान की धाराओं में
हमने अपनी शाख गंवाई
गली-मोहल्ले सुलग रहे हैं
तुमने ही यह आग लगाई
सपनों की ताबीर लिखें पर
चुभती मन को पीर पराई
खिड़की है पर दृश्य नदारद
उन्नति से यह मिली कमाई
सुख ने हमको प्यासा रक्खा
दुःख ने अपनी प्यास बुझाई
चुभते हैं सुधियों के नश्तर
मन के पैरों फटी विमाई
खिलना था फूलों को लेकिन
काँटों ने क्यों बाड़ बिछाई
जिन्दा रहने की कोशिश में
मुर्दों को मिल गई ख़ुदाई
सागर तक न पहुंची नदियाँ
किसने उल्टी गंग बहाई
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
Sunday, June 19, 2011
Saturday, June 18, 2011
अन्नदाता हरित-क्रांति के सपूतों के नाम
कन्धों पर आकाश उठाये फिरते हैं
हरित-क्रांति के ये सपूत ही मरते हैं
धरती मां की कोख हरी करने वाले
मेहनतकश ये हाथ दुखों से गुजरते हैं
वसुंधरा है अन्नपूर्णा इनके दम से
क्यों ये तिल-तिल यहाँ बिखरते हैं
जीडीपी का भरम इन्ही से कायम है
इनकी ख़ातिर हम झूठा दम भरते हैं
ये ज़िंदा हैं जब तक हम भी ज़िंदा हैं
कर्ज़े इनके फिर क्यों नहीं उतरते हैं
@@स.सु.@@श्र.कु.उ.तिवारी
हरित-क्रांति के ये सपूत ही मरते हैं
धरती मां की कोख हरी करने वाले
मेहनतकश ये हाथ दुखों से गुजरते हैं
वसुंधरा है अन्नपूर्णा इनके दम से
क्यों ये तिल-तिल यहाँ बिखरते हैं
जीडीपी का भरम इन्ही से कायम है
इनकी ख़ातिर हम झूठा दम भरते हैं
ये ज़िंदा हैं जब तक हम भी ज़िंदा हैं
कर्ज़े इनके फिर क्यों नहीं उतरते हैं
@@स.सु.@@श्र.कु.उ.तिवारी
Friday, June 17, 2011
बोझा दिल पर,कंधे खाली...
बोझा दिल पर,कंधे खाली
हर आदम ख़ुद हुआ सवाली
इस जीवन में इतने बंधन
किस क़ीमत पर मिले बहाली
इस पीढ़ी को क्या दे पाए
खुली हवा में महल ख़याली
पीड़ा थी भूखे बच्चे की
ज़ार-ज़ार क्यों रोई प्याली
अपना दुखड़ा भूल-भाल कर
दूजों का दुःख रोई रुदाली
इतिहासों की बात करें क्या
वर्तमान जब हुआ मवाली
क़र्ज़ भरेगी आने वाली पीढ़ी
हमने हर ली सब हरियाली
ज़िंदा रहने की कोशिश,पर
समय फिरे है लिए दुनाली
सत्ता का दोहन करते हैं
जिनको करना है रखवाली
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी
हर आदम ख़ुद हुआ सवाली
इस जीवन में इतने बंधन
किस क़ीमत पर मिले बहाली
इस पीढ़ी को क्या दे पाए
खुली हवा में महल ख़याली
पीड़ा थी भूखे बच्चे की
ज़ार-ज़ार क्यों रोई प्याली
अपना दुखड़ा भूल-भाल कर
दूजों का दुःख रोई रुदाली
इतिहासों की बात करें क्या
वर्तमान जब हुआ मवाली
क़र्ज़ भरेगी आने वाली पीढ़ी
हमने हर ली सब हरियाली
ज़िंदा रहने की कोशिश,पर
समय फिरे है लिए दुनाली
सत्ता का दोहन करते हैं
जिनको करना है रखवाली
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी
मन हो या गुलमोहर,पीड़ा की गर्मी से ही दहकता है...
मन हो या गुलमोहर,पीड़ा की गर्मी से ही दहकता है
जो अपने दर्द जज्ब कर ले,वही इन्सान महकता है
सुख-दुःख तो आते-जाते,तासीर मगर उल्टी पाई
दुःख में इन्सान संयमित,सुख में ही बहकता है
...
रिश्ते-नाते,रश्में-बंधन यूँ जीवन भर चलते रहते
कितना भी ठुकराओ,सुधियों का दंश लहकता है
जीवन जैसे एक जुआं हो या बाजी शतरंजों की
शह का मौका मिलते ही,ये शापित मन चहकता है
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
जो अपने दर्द जज्ब कर ले,वही इन्सान महकता है
सुख-दुःख तो आते-जाते,तासीर मगर उल्टी पाई
दुःख में इन्सान संयमित,सुख में ही बहकता है
...
रिश्ते-नाते,रश्में-बंधन यूँ जीवन भर चलते रहते
कितना भी ठुकराओ,सुधियों का दंश लहकता है
जीवन जैसे एक जुआं हो या बाजी शतरंजों की
शह का मौका मिलते ही,ये शापित मन चहकता है
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
Thursday, June 16, 2011
एक गरीब विरहिणी की व्यथा-कथा
आषाढ़ के प्रथम दिवस पर एक गरीब विरहिणी
की व्यथा-कथा :-
''अबकी बरसात में जाने यह क्या हुआ
आँखों के साथ सारा का सारा घर चुआ''
की व्यथा-कथा :-
''अबकी बरसात में जाने यह क्या हुआ
आँखों के साथ सारा का सारा घर चुआ''
Wednesday, June 15, 2011
दिल में इक ख़ुमार-सा है...
दिल में इक ख़ुमार-सा है
जो अनकहे प्यार-सा है
रोज आते हैं वो ख़्वाबों में
समां मौसमे-बहार-सा है
चाँद उतरा है इस झील में
मिलने का इंतज़ार-सा है
हवाओं में यूँ कशिश पाई
जुल्फ़ों से कारोबार-सा है
वो हंसी साथ,वो हंसी बातें
मीठे सपनों से,करार-सा है
ऐसे अंदाज़ से उठी वो नज़र
फिजां में इक गुबार-सा है
हम हैं या उनकी जुस्तजू है
यह नशा ख़ुशगवार-सा है
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
१६/०५/२०११
जो अनकहे प्यार-सा है
रोज आते हैं वो ख़्वाबों में
समां मौसमे-बहार-सा है
चाँद उतरा है इस झील में
मिलने का इंतज़ार-सा है
हवाओं में यूँ कशिश पाई
जुल्फ़ों से कारोबार-सा है
वो हंसी साथ,वो हंसी बातें
मीठे सपनों से,करार-सा है
ऐसे अंदाज़ से उठी वो नज़र
फिजां में इक गुबार-सा है
हम हैं या उनकी जुस्तजू है
यह नशा ख़ुशगवार-सा है
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
१६/०५/२०११
Monday, June 13, 2011
सियासती किरदारों का अंदाज़ वहशियाना है...
सियासती किरदारों का अंदाज़ वहशियाना है
इनका ये रुख सालों से खूब जाना-पहचाना है
रहबरी को भूलकर ख़ुद हो गए हैं राहजन
अपना ये वतन कितना लगता बेगाना है
लूट रहे अस्मिता देखो अपने ही चमन की
जिससे जुड़ा इनका ख़ुद का आबो-दाना है
नोंच कर खा रहे हैं,इंसानी जिस्मों को
इनके जिस्मों में कोई हैवानी ताना-बाना है
चुनकर के आम ने ही बनाया है खास इन्हें
जो इनकी ख़ातिर महज़ इक वोटर पुराना है
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
इनका ये रुख सालों से खूब जाना-पहचाना है
रहबरी को भूलकर ख़ुद हो गए हैं राहजन
अपना ये वतन कितना लगता बेगाना है
लूट रहे अस्मिता देखो अपने ही चमन की
जिससे जुड़ा इनका ख़ुद का आबो-दाना है
नोंच कर खा रहे हैं,इंसानी जिस्मों को
इनके जिस्मों में कोई हैवानी ताना-बाना है
चुनकर के आम ने ही बनाया है खास इन्हें
जो इनकी ख़ातिर महज़ इक वोटर पुराना है
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
Saturday, June 11, 2011
इंक़लाब आने दो...
अब न रोको ख़ुद को,यारो,वो सैलाब आने दो
पैंसठ साल बाद ही सही, इंक़लाब आने दो
मिटाना है यहाँ से सियारों और भेड़ियों को
बस दिन-रात यूँ कुछ ऐसे ही ख़्वाब आने दो
बहुत तड़पाया है हमें सियासती दरिंदों ने
उनके हिस्से में भी कुछ अज़ाब आने दो
सुना तो है कि हुकूमत अब पशोपेश में है
फिर भी ठहरो ज़रा,सरकारी जवाब आने दो
ये तेरा खून है अब तुझको इसी खूं की कसम
मिटा के ख़ुद को आज़ादी पे शवाब आने दो
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
पैंसठ साल बाद ही सही, इंक़लाब आने दो
मिटाना है यहाँ से सियारों और भेड़ियों को
बस दिन-रात यूँ कुछ ऐसे ही ख़्वाब आने दो
बहुत तड़पाया है हमें सियासती दरिंदों ने
उनके हिस्से में भी कुछ अज़ाब आने दो
सुना तो है कि हुकूमत अब पशोपेश में है
फिर भी ठहरो ज़रा,सरकारी जवाब आने दो
ये तेरा खून है अब तुझको इसी खूं की कसम
मिटा के ख़ुद को आज़ादी पे शवाब आने दो
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
Friday, June 10, 2011
जिन्हें रोटी चाहिए,उन्हें तुम नारे देते हो...
जिन्हें रोटी चाहिए,उन्हें तुम नारे देते हो
अरे धूर्तों,इस देश को क्यों मारे देते हो?
लोगों की भूख पर सेंकते हो रोटियां
जले हुए पर नमक के फुहारे देते हो?
जो भी जुड़ा है इस देश की ज़मीन से
उसे ही क्यों भला हमेशा बिसारे देते हो?
वो भला क्या जानें सलीब का मतलब
उनके लिए फांसी के सहारे देते हो ?
लो संभल जाओ, सियासत के गिद्धों,वर्ना
कहोगे क्यों हमारी इज्ज़त उतारे देते हो!
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
अरे धूर्तों,इस देश को क्यों मारे देते हो?
लोगों की भूख पर सेंकते हो रोटियां
जले हुए पर नमक के फुहारे देते हो?
जो भी जुड़ा है इस देश की ज़मीन से
उसे ही क्यों भला हमेशा बिसारे देते हो?
वो भला क्या जानें सलीब का मतलब
उनके लिए फांसी के सहारे देते हो ?
लो संभल जाओ, सियासत के गिद्धों,वर्ना
कहोगे क्यों हमारी इज्ज़त उतारे देते हो!
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
डरे-सहमे से हैं यहाँ हालात,हम क्या करें...
डरे-सहमे से हैं यहाँ हालात,हम क्या करें
दर्द से सिसकते हुए दिन-रात,हम क्या करें
इस क़दर इन भेड़ियों की दरिंदगी देखकर
घायल हो रहे इंसानी जज्बात,हम क्या करें
दलीलें बेच दी हैं इन सियासत के दलालों ने
हो गए कमज़र्फ सब बद्जात,हम क्या करें
यहाँ किसका करें विश्वास,किसकी आस हो
मिल रहे आघात पर आघात,हम क्या करें
यहाँ चोरी भी है और उस पर सीनाजोरियां भी
अंधेरों के हाथों में हमारा प्रभात,हम क्या करें
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
दर्द से सिसकते हुए दिन-रात,हम क्या करें
इस क़दर इन भेड़ियों की दरिंदगी देखकर
घायल हो रहे इंसानी जज्बात,हम क्या करें
दलीलें बेच दी हैं इन सियासत के दलालों ने
हो गए कमज़र्फ सब बद्जात,हम क्या करें
यहाँ किसका करें विश्वास,किसकी आस हो
मिल रहे आघात पर आघात,हम क्या करें
यहाँ चोरी भी है और उस पर सीनाजोरियां भी
अंधेरों के हाथों में हमारा प्रभात,हम क्या करें
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
Monday, June 6, 2011
हम नहीं टूटे
ज़िंदगी की दौड़ में
हम बहुत पीछे छूटे हैं,
हम नहीं टूटे
हमारे ख्वाब टूटे हैं...
रोशनी के हाथों में बेड़ियाँ
अंधेरों ने खोले हैं यातनाघर
जी रहे विषपायी पल-छिन
जीतना है दुविधा का महासमर
क्या खोया-क्या पाया
मत कहो-करम फूटे हैं
प्रायश्चित के पीर-भवन में
हमारे दावे झूटे हैं...
(श्र.कु.उ.तिवारी)
हम बहुत पीछे छूटे हैं,
हम नहीं टूटे
हमारे ख्वाब टूटे हैं...
रोशनी के हाथों में बेड़ियाँ
अंधेरों ने खोले हैं यातनाघर
जी रहे विषपायी पल-छिन
जीतना है दुविधा का महासमर
क्या खोया-क्या पाया
मत कहो-करम फूटे हैं
प्रायश्चित के पीर-भवन में
हमारे दावे झूटे हैं...
(श्र.कु.उ.तिवारी)
Friday, June 3, 2011
चलो,कोई नया सफ़र ढूंढ़े...
चलो,कोई नया सफ़र ढूंढ़े
हर तरफ है मेरी नज़र,ढूंढ़े
ये शहर हो गया है वीराना
किस तरह हम अपना घर ढूंढ़े
दें अंधेरे को रोशनी के ज़ख्म
या फिर कोई नयी सहर ढूंढ़े
अब भी ज़िंदा हैं मेरे अफ़साने
वक्त मिल जाय तो ज़हर ढूंढ़े
ख़त के आने का इंतज़ार नहीं
फिर भी चलकरके नामावर ढूंढ़े
लम्हा-लम्हा लुटाया यादों को
ऐ ज़िंदगी,तुझे कहाँ-कहाँ ढूंढ़े
जीना है जिन्दादिली का नाम
चलके,यारो,यहां कहीं बसर ढूंढ़े
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
@@ यह ग़ज़ल 'सारिका' के सितम्बर,१९७७
अंक में छपी थी@@
हर तरफ है मेरी नज़र,ढूंढ़े
ये शहर हो गया है वीराना
किस तरह हम अपना घर ढूंढ़े
दें अंधेरे को रोशनी के ज़ख्म
या फिर कोई नयी सहर ढूंढ़े
अब भी ज़िंदा हैं मेरे अफ़साने
वक्त मिल जाय तो ज़हर ढूंढ़े
ख़त के आने का इंतज़ार नहीं
फिर भी चलकरके नामावर ढूंढ़े
लम्हा-लम्हा लुटाया यादों को
ऐ ज़िंदगी,तुझे कहाँ-कहाँ ढूंढ़े
जीना है जिन्दादिली का नाम
चलके,यारो,यहां कहीं बसर ढूंढ़े
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
@@ यह ग़ज़ल 'सारिका' के सितम्बर,१९७७
अंक में छपी थी@@
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