Friday, June 3, 2011

चलो,कोई नया सफ़र ढूंढ़े...

चलो,कोई नया सफ़र ढूंढ़े
हर तरफ है मेरी नज़र,ढूंढ़े

ये शहर हो गया है वीराना
किस तरह हम अपना घर ढूंढ़े

दें अंधेरे को रोशनी के ज़ख्म
या फिर कोई नयी सहर ढूंढ़े

अब भी ज़िंदा हैं मेरे अफ़साने
वक्त मिल जाय तो ज़हर ढूंढ़े

ख़त के आने का इंतज़ार नहीं
फिर भी चलकरके नामावर ढूंढ़े

लम्हा-लम्हा लुटाया यादों को
ऐ ज़िंदगी,तुझे कहाँ-कहाँ ढूंढ़े

जीना है जिन्दादिली का नाम
चलके,यारो,यहां कहीं बसर ढूंढ़े
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
@@ यह ग़ज़ल 'सारिका' के सितम्बर,१९७७
अंक में छपी थी@@

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