डरे-सहमे से हैं यहाँ हालात,हम क्या करें
दर्द से सिसकते हुए दिन-रात,हम क्या करें
इस क़दर इन भेड़ियों की दरिंदगी देखकर
घायल हो रहे इंसानी जज्बात,हम क्या करें
दलीलें बेच दी हैं इन सियासत के दलालों ने
हो गए कमज़र्फ सब बद्जात,हम क्या करें
यहाँ किसका करें विश्वास,किसकी आस हो
मिल रहे आघात पर आघात,हम क्या करें
यहाँ चोरी भी है और उस पर सीनाजोरियां भी
अंधेरों के हाथों में हमारा प्रभात,हम क्या करें
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
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