Saturday, June 11, 2011

इंक़लाब आने दो...

अब न रोको ख़ुद को,यारो,वो सैलाब आने दो
पैंसठ साल बाद ही सही, इंक़लाब आने दो

मिटाना है यहाँ से सियारों और भेड़ियों को
बस दिन-रात यूँ कुछ ऐसे ही ख़्वाब आने दो

बहुत तड़पाया है हमें सियासती दरिंदों ने
उनके हिस्से में भी कुछ अज़ाब आने दो

सुना तो है कि हुकूमत अब पशोपेश में है
फिर भी ठहरो ज़रा,सरकारी जवाब आने दो

ये तेरा खून है अब तुझको इसी खूं की कसम
मिटा के ख़ुद को आज़ादी पे शवाब आने दो

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

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