ज़िंदगी की दौड़ में
हम बहुत पीछे छूटे हैं,
हम नहीं टूटे
हमारे ख्वाब टूटे हैं...
रोशनी के हाथों में बेड़ियाँ
अंधेरों ने खोले हैं यातनाघर
जी रहे विषपायी पल-छिन
जीतना है दुविधा का महासमर
क्या खोया-क्या पाया
मत कहो-करम फूटे हैं
प्रायश्चित के पीर-भवन में
हमारे दावे झूटे हैं...
(श्र.कु.उ.तिवारी)
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