Friday, December 30, 2011

मेरी आँखों में सुधियाँ हैं,तुम्हारी आँखों में सपने-

(एक)
सैकड़ों की खिलखिलाहटों में
मैंने उस हंसी को पहचान लिया
जो तुम्हारी थी--
हजारों की ख़ामोशियों में भी
मैंने उस ख़ामोशी को सुन लिया
जो तुम्हारी थी--
लाखों की भीड़ में देख लिया मैंने
तुम्हारी आँखों में झिलमिलाते
चरागों को--
जाने क्यों एक की भीड़ में
तुम मुझे नहीं पहचान सकी,
नहीं जान सकी...

(दो)
मेरी आँखों में सुधियाँ हैं,
तुम्हारी आँखों में सपने-
और इन आँखों के बीच
खड़े हैं,
चुप्पी के विन्ध्याचल
और मुट्ठियों में
खँडहर होता हुआ
हिमालय...

(तीन)
मैं तुम्हे मिल नहीं पाता
यह मेरा ही संविधान है,
और तुम मुझे छोड़ना नहीं चाहते
यह तुम्हारी मर्यादा है--
एक की हार-जीत में

दूसरे की जीत-हार है

***श्रवण***

Thursday, December 29, 2011

बहार को तरस रहे,एक पतझर की तरह...

(एक)
टूटा है अपना दिल भी अपने घर की तरह
जी रहे हैं हम बयाबां में खँडहर की तरह
अपना चमन,वो आशियाँ,जाने किधर गए
बहार को तरस रहे,एक पतझर की तरह

(दो)
हर रात तलाशती अपने लिए सहर
हर मंजिल पे शुरू होता नया सफ़र
ज़िंदगी को ज़िंदा रखना है मुनासिब
ताकि कोई उम्र कहीं यूँ न जाये ठहर

(तीन)
बर्फ के शहर में यह उम्र पिघलने लगी
ज़िंदगी फिर बैसाखियों पर चलने लगी
हो गया अँधेरा जब मन के जंगलों में
दिल की शमां अपने आप जलने लगी

***श्रवण***

Wednesday, December 28, 2011

अपनी ज़िंदगी भी आजकल...

(एक)
ख़ाली वक़्त में यूँ चुपचाप
बैठना नहीं अच्छा,
हुज़ूर!शिकार कीजिये कि
दिल हमारे पास है
और
तीर आपके पास...

(दो)
अपने घर से उसने हमें
लौटाया बार-बार,
हर बार यह कहकर
कि अभी जाइये,
फिर आइयेगा
हम करेंगे इंतज़ार..

(तीन)
जहाँ उन आँखों में
सुधियाँ बहुत गहरी हुई होंगी,
अपनी ज़िंदगी भी आजकल
वहीँ ठहरी हुई होगी...

***श्रवण***

Tuesday, December 27, 2011

वीरानियाँ चीख़ती हैं खामोशियों की भाषा में...

(एक)
पेड़ चुप हैं,रात ख़ामोश
लोग सब गहरी नींद के
आगोश में हैं,
सिर्फ़ चीख़ रहाहूँ मैं
अपनी कलम से लगातार
काग़ज पर..

(दो)
बहुत दिनों के बाद वह मिली
खिलखिलाती हुई,
चहरे पर ख़ुशियों के
सौ-सौ दीप जलाये-
पर तस्वीर में...

(तीन)
वीरानियाँ चीख़ती हैं
खामोशियों की भाषा में
और मैं सुनता हूँ तुम्हे
आत्मा के कानों से..

***श्रवण***

Monday, December 26, 2011

देखना है अबकी आदमी कहाँ से टूटता है...

(एक)
जब भी तेरी गली से मैं बेअख्तियार गुज़रा
ऐ दोस्त! क्यों ये तुझ पे बहुत नागवार गुज़रा
रही दिल में ये तमन्ना,कोई हाल-ए-दिल सुन ले
पर ऐसी बदनसीबी,न कोई गमगुसार गुजरा

(दो)
देखना है अबकी आदमी कहाँ से टूटता है
प्यास का सहारा आखिर कहाँ छूटता है
कितने आराम से होता था सफ़र साथ-साथ
अब तो यहाँ आदमी आदमी को लूटता है

(तीन)
ये ज़िन्दगी की शाम सिर्फ़ शाम ही तो है
सुधियों में कई नाम सिर्फ़ नाम ही तो हैं
तमाम उम्र वो नाराज़ रहे किस ख़ता पर
इस उम्र में मुहब्बत अब इंतकाम ही तो है

***श्रवण***

Sunday, December 25, 2011

हमने फूलों से ज़ख्म खाए हैं...

(एक)
अब दुआओं में असर बाकी नहीं
हादसों से कोई घर बाकी नहीं
घिर गई है ज़िंदगी इस शहर में
मौत का कोई भी डर बाकी नहीं...

(दो)
ऐसा भी ज़िंदगी में हुआ है कभी-कभी
फूलों को हमने हाथ से छुआ कभी-कभी
ये तेरी बात नहीं,जिक्र है ज़माने का
लोगों ने हमें दी है दुआ भी कभी-कभी

(तीन)
हमने फूलों से ज़ख्म खाए हैं
और काँटों से घर सजाये हैं
रोशनी हो उनके घर,इसके लिए
अपने अरमानों को जलाये हैं...

***श्रवण***

Saturday, December 24, 2011

कुछ कहते हैं ये भाव...

(१)

भोरे कुहकी कोयल रानी
कैसी मीठी तान,
आज छुआ मन के अधरों ने
कोई मीठा पान....

(२)
खुले बाल लेकर पुरवैया
चढ़ी नीम की डार,
दोपहर बाद भरा यौवन
तो लाँघ गयी दीवार...

(३)
चितवन में आशा की झिलमिल
चेहरे पर खुशियों का हास,
बाँहों की आतुरता कहती
बंधन का छू लें आकाश...

***श्रवण***

Sunday, December 18, 2011

सामने का द्वार चलो,एक बार खोलें...

बहुत बदनाम हुए घर के पिछवाड़े
सामने का द्वार चलो,एक बार खोलें

वर्षों से जमा है मौन इस आंगन में
प्यार भरे मीठे-मीठे, दो बोल बोलें

नींद नहीं आती रात भर अकेले में
तुम्हारे पहलू में थोड़ी देर सो लें

मीलों तक बियाबान और हम अकेले
चलो किसी राही के साथ ही हो लें

आने वाले दिनों को खूब गुदगुदाएँ
विगत सन्दर्भों के अर्थ क्यों टटोलें

***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Thursday, December 15, 2011

पानी की कीमत जाकर उन रेगिस्तानों से पूछो...

मेरी प्यास घनी कितनी, मेरे अरमानों से पूछो
पानी की कीमत जाकर उन रेगिस्तानों से पूछो

मन की धरती पर प्यासा था एक समंदर
मेरी चाहत की गहराई,मेरे बयानों से पूछो

शमां के जलने को त्याग समझाने वालो
जलने की चाहत को अब परवानों से पूछो

हर आंगन में क्षत-विक्षत हैं रिश्तों के ढेर
पीड़ा रहने वालों की सभी मकानों से पूछो

रोजी-रोटी को निगला यूँ नारों-हड़तालों ने
आम आदमी की पीड़ा कारखानों से पूछो

इस होटल में कैसे-कैसे गुल खिलते हैं
सलाम ठोंकने वाले उन दरवानों से पूछो

मत पूछो किसने कतरे नाज़ुक पंख हमारे
हमारी उपलब्धियों को हमारी उड़ानों से पूछो

बंदिश थी,कहना था जो कुछ,कह न पाए
शब्दों की तनहाई को मेरे तरानों से पूछो

रहे ज़मीनों पर क्यों,हम ऊपर उठ न पाए
इसका कारण भी तुम उन्ही मचानों से पूछो

***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Sunday, December 11, 2011

तुम पे था ऐतबार,उन वादों का क्या हुआ...

तुम पे था ऐतबार,उन वादों का क्या हुआ
हिमालय से भी ऊँचे उन इरादों का क्या हुआ
चारो तरफ थे इश्क के आसार फिजाओं में
बुलबुल ये पूछती है की सयादों का क्या हुआ

***श्रवण***

Saturday, December 10, 2011

जो भी इस जिंदगी में हालात के मारे मिले...

जो भी इस जिंदगी में हालात के मारे मिले
उन्ही लोगों में हमें बेसहारों के सहारे मिले

जिसने भी प्यार का इज़हार किया है खुलकर
उनकी आँखों में जो भी सपने थे, कुंवारे मिले

वो जिन्हें छू सकी न परछाइयों की बाजीगरी
ऐसे ख़ुद्दार कड़ी धूप में जीवन को संवारे मिले

वो जो फ़रयाद की कोशिश में जुटे हैं हर पल
उन्हें तसल्लियों के फिर से कुछ शरारे मिले

हमने हर लफ्ज़ को न जाने कितनी बार पढ़ा
जितने भी मुफ़लिसी में ख़त हमें तुम्हारे मिले

***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Friday, December 9, 2011

अब तो बस प्यार बाकी रहा अफ़सानों में...

ज़िस्म तो रह रहे हैं शहर के मकानों में
क्यूँ रूहें भटकती हैं यूँ दूर बियाबानों में

ज़िस्म तन्हां हैं और रूहें बहुत प्यासी हैं
अब तो बस प्यार बाकी रहा अफ़सानों में

दर्द के दावे मिले हमको विरासत में यहाँ
नाम शामिल हो गया अपना भी परवानों में

बढ़ गयी है बेरुखी,बढ़ने लगे हैं फासले भी
चलके अब ढूंढें कोई उन पुरानी पहचानों में

हर तरफ चेहरों की रंगत देखकर लगने लगा
क़ैद हैं रूहें यहाँ पर ज़िस्म के तहखानों में

***श्रवण***

Thursday, December 8, 2011

ये मेरी प्यास ...

दिल का जो द्वार तुमने खोल दिया है फिर से
ये मेरी प्यास दौड़ कर तेरे पास चली जाती है

***श्रवण***

Friday, December 2, 2011

सफ़र हो रोशनी में...

अंधेरों में चलोगे,कहाँ किसका साथ पाओगे
सफ़र हो रोशनी में तब तो साया साथ होगा

***श्रवण***

सन्नाटा जब बहुत गहरा हो जाता है....

सन्नाटा जब बहुत गहरा हो जाता है,
आसपास का हर चेहरा बहरा हो जाता है,
मूक पर्वत के सामने चिल्लाता हूँ ऊबकर,
अपना नाम लेकर--
अपनी ही आवाज़ सुनने के लिए...

***श्रवण***

Thursday, December 1, 2011

क्या यही उपलब्धियां हम कमाए हैं? ...

हमने वीरानियों के गाँव बसाये हैं
तभी हम पर बियाबानों के साये हैं
प्रगति और विकास की भागदौड़ में
क्या यही उपलब्धियां हम कमाए हैं?

***श्रवण***