Thursday, December 29, 2011

बहार को तरस रहे,एक पतझर की तरह...

(एक)
टूटा है अपना दिल भी अपने घर की तरह
जी रहे हैं हम बयाबां में खँडहर की तरह
अपना चमन,वो आशियाँ,जाने किधर गए
बहार को तरस रहे,एक पतझर की तरह

(दो)
हर रात तलाशती अपने लिए सहर
हर मंजिल पे शुरू होता नया सफ़र
ज़िंदगी को ज़िंदा रखना है मुनासिब
ताकि कोई उम्र कहीं यूँ न जाये ठहर

(तीन)
बर्फ के शहर में यह उम्र पिघलने लगी
ज़िंदगी फिर बैसाखियों पर चलने लगी
हो गया अँधेरा जब मन के जंगलों में
दिल की शमां अपने आप जलने लगी

***श्रवण***

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