मेरी प्यास घनी कितनी, मेरे अरमानों से पूछो
पानी की कीमत जाकर उन रेगिस्तानों से पूछो
मन की धरती पर प्यासा था एक समंदर
मेरी चाहत की गहराई,मेरे बयानों से पूछो
शमां के जलने को त्याग समझाने वालो
जलने की चाहत को अब परवानों से पूछो
हर आंगन में क्षत-विक्षत हैं रिश्तों के ढेर
पीड़ा रहने वालों की सभी मकानों से पूछो
रोजी-रोटी को निगला यूँ नारों-हड़तालों ने
आम आदमी की पीड़ा कारखानों से पूछो
इस होटल में कैसे-कैसे गुल खिलते हैं
सलाम ठोंकने वाले उन दरवानों से पूछो
मत पूछो किसने कतरे नाज़ुक पंख हमारे
हमारी उपलब्धियों को हमारी उड़ानों से पूछो
बंदिश थी,कहना था जो कुछ,कह न पाए
शब्दों की तनहाई को मेरे तरानों से पूछो
रहे ज़मीनों पर क्यों,हम ऊपर उठ न पाए
इसका कारण भी तुम उन्ही मचानों से पूछो
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***
No comments:
Post a Comment