Tuesday, December 27, 2011

वीरानियाँ चीख़ती हैं खामोशियों की भाषा में...

(एक)
पेड़ चुप हैं,रात ख़ामोश
लोग सब गहरी नींद के
आगोश में हैं,
सिर्फ़ चीख़ रहाहूँ मैं
अपनी कलम से लगातार
काग़ज पर..

(दो)
बहुत दिनों के बाद वह मिली
खिलखिलाती हुई,
चहरे पर ख़ुशियों के
सौ-सौ दीप जलाये-
पर तस्वीर में...

(तीन)
वीरानियाँ चीख़ती हैं
खामोशियों की भाषा में
और मैं सुनता हूँ तुम्हे
आत्मा के कानों से..

***श्रवण***

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