Friday, December 30, 2011

मेरी आँखों में सुधियाँ हैं,तुम्हारी आँखों में सपने-

(एक)
सैकड़ों की खिलखिलाहटों में
मैंने उस हंसी को पहचान लिया
जो तुम्हारी थी--
हजारों की ख़ामोशियों में भी
मैंने उस ख़ामोशी को सुन लिया
जो तुम्हारी थी--
लाखों की भीड़ में देख लिया मैंने
तुम्हारी आँखों में झिलमिलाते
चरागों को--
जाने क्यों एक की भीड़ में
तुम मुझे नहीं पहचान सकी,
नहीं जान सकी...

(दो)
मेरी आँखों में सुधियाँ हैं,
तुम्हारी आँखों में सपने-
और इन आँखों के बीच
खड़े हैं,
चुप्पी के विन्ध्याचल
और मुट्ठियों में
खँडहर होता हुआ
हिमालय...

(तीन)
मैं तुम्हे मिल नहीं पाता
यह मेरा ही संविधान है,
और तुम मुझे छोड़ना नहीं चाहते
यह तुम्हारी मर्यादा है--
एक की हार-जीत में

दूसरे की जीत-हार है

***श्रवण***

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