Sunday, December 25, 2011

हमने फूलों से ज़ख्म खाए हैं...

(एक)
अब दुआओं में असर बाकी नहीं
हादसों से कोई घर बाकी नहीं
घिर गई है ज़िंदगी इस शहर में
मौत का कोई भी डर बाकी नहीं...

(दो)
ऐसा भी ज़िंदगी में हुआ है कभी-कभी
फूलों को हमने हाथ से छुआ कभी-कभी
ये तेरी बात नहीं,जिक्र है ज़माने का
लोगों ने हमें दी है दुआ भी कभी-कभी

(तीन)
हमने फूलों से ज़ख्म खाए हैं
और काँटों से घर सजाये हैं
रोशनी हो उनके घर,इसके लिए
अपने अरमानों को जलाये हैं...

***श्रवण***

No comments:

Post a Comment