Sunday, December 18, 2011

सामने का द्वार चलो,एक बार खोलें...

बहुत बदनाम हुए घर के पिछवाड़े
सामने का द्वार चलो,एक बार खोलें

वर्षों से जमा है मौन इस आंगन में
प्यार भरे मीठे-मीठे, दो बोल बोलें

नींद नहीं आती रात भर अकेले में
तुम्हारे पहलू में थोड़ी देर सो लें

मीलों तक बियाबान और हम अकेले
चलो किसी राही के साथ ही हो लें

आने वाले दिनों को खूब गुदगुदाएँ
विगत सन्दर्भों के अर्थ क्यों टटोलें

***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

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