Monday, December 26, 2011

देखना है अबकी आदमी कहाँ से टूटता है...

(एक)
जब भी तेरी गली से मैं बेअख्तियार गुज़रा
ऐ दोस्त! क्यों ये तुझ पे बहुत नागवार गुज़रा
रही दिल में ये तमन्ना,कोई हाल-ए-दिल सुन ले
पर ऐसी बदनसीबी,न कोई गमगुसार गुजरा

(दो)
देखना है अबकी आदमी कहाँ से टूटता है
प्यास का सहारा आखिर कहाँ छूटता है
कितने आराम से होता था सफ़र साथ-साथ
अब तो यहाँ आदमी आदमी को लूटता है

(तीन)
ये ज़िन्दगी की शाम सिर्फ़ शाम ही तो है
सुधियों में कई नाम सिर्फ़ नाम ही तो हैं
तमाम उम्र वो नाराज़ रहे किस ख़ता पर
इस उम्र में मुहब्बत अब इंतकाम ही तो है

***श्रवण***

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