Sunday, January 1, 2012

आखिर हमारे होने का किसी को अहसास तो हो...

(एक)
ज़िंदगी में हम कभी यूँ इतने परेशान तो न थे
ग़मों का सहारा था,खुशियों के सामान तो न थे

(दो)
आखिर हमारे होने का किसी को अहसास तो हो
बेशक नज़रों से रहे दूर पर दिल के पास तो हो

(तीन)
बेहद रो रही थी एक औरत रात को गुमसुम
जो पूछा कौन है,तो वो अपनी ज़िंदगी निकली

(चार)
फिरतें हैं हाथों में लिए अपने दिल के टुकड़ों को
लूटा है फिर उसी ने मुहब्बत का नाम ले कर

***श्रवण***

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