दर्द सांसों में बसा हो तो उसे निकालिए
पीड़ा को आस्तीन के सापों सा न पालिए
इतनी ख़ुशियाँ हैं यहाँ ज़िंदगी में,यारो
उन्हें चुनिए,गुनिये,सहेजिये,सम्हालिए
***श्रवण***
Tuesday, January 31, 2012
कहने को तो वो सख्श बड़ा शीरीं-जुबान है...
कहने को तो वो सख्श बड़ा शीरीं-जुबान है
पर उसके दिल में एक कोयले की खान है
क़ाबिल-ए-गौर हैं उसकी यहाँ बेशर्मियाँ भी
कितना भी ज़लील करो,बड़ी सख्त जान है
***श्रवण***
पर उसके दिल में एक कोयले की खान है
क़ाबिल-ए-गौर हैं उसकी यहाँ बेशर्मियाँ भी
कितना भी ज़लील करो,बड़ी सख्त जान है
***श्रवण***
करें किस पर यहाँ विश्वास,यारो?
करें किस पर यहाँ विश्वास,यारो
यहाँ का हर सख्श नारद हुआ है
हमने सीखा जो उड़ना तब तक
आकाश ही देखो नदारद हुआ है
***श्रवण***
यहाँ का हर सख्श नारद हुआ है
हमने सीखा जो उड़ना तब तक
आकाश ही देखो नदारद हुआ है
***श्रवण***
Sunday, January 29, 2012
ज़िंदगी है कि है ये कोई तिलिस्म
लोग भी क्यों प्यार-व्यार करते हैं
नक़ली रिश्तों से कारोबार करते हैं
वो अपने शीशे सम्हालकर रखना
लोग यहाँ पत्थर से वार करते हैं
वो जो करते हैं रोज सत्य की बातें
अंधेरों में झूठ का प्रचार करते हैं
इतने घपले किये हैं मान्यवर ने
कि अब समाज का सुधार करते हैं
कर दिया है जबसे नेत्रदान,यारो
वे किडनियों का व्योपार करते हैं
जिनके कतरे गए हैं पंख वे भी
उड़ानों पे खूब ऐतबार करते हैं
ज़िंदगी है कि है ये कोई तिलिस्म
हम भी बाज़ीगरी से प्यार करते हैं
***श्रवण***
नक़ली रिश्तों से कारोबार करते हैं
वो अपने शीशे सम्हालकर रखना
लोग यहाँ पत्थर से वार करते हैं
वो जो करते हैं रोज सत्य की बातें
अंधेरों में झूठ का प्रचार करते हैं
इतने घपले किये हैं मान्यवर ने
कि अब समाज का सुधार करते हैं
कर दिया है जबसे नेत्रदान,यारो
वे किडनियों का व्योपार करते हैं
जिनके कतरे गए हैं पंख वे भी
उड़ानों पे खूब ऐतबार करते हैं
ज़िंदगी है कि है ये कोई तिलिस्म
हम भी बाज़ीगरी से प्यार करते हैं
***श्रवण***
Saturday, January 28, 2012
मेरे इस दर्द को तुम अपने रु-ब-रु रखना
मेरे इस दर्द को तुम अपने रु-ब-रु रखना
इस तरह दिल की मेरी छोटी आरजू रखना
हो गए प्यार के लम्हे भी मुफलिसों जैसे
जिंदगी को हमने सिखाया जुस्तजू रखना
प्यास ही प्यास है अब अपना वजूद मगर
ऐ सहरा, तू समंदर की ज़रा आबरू रखना
***श्रवण***
इस तरह दिल की मेरी छोटी आरजू रखना
हो गए प्यार के लम्हे भी मुफलिसों जैसे
जिंदगी को हमने सिखाया जुस्तजू रखना
प्यास ही प्यास है अब अपना वजूद मगर
ऐ सहरा, तू समंदर की ज़रा आबरू रखना
***श्रवण***
हमें भी प्यार से गर तुम कभी मिले होते
हमें भी प्यार से गर तुम कभी मिले होते
हमारे बीच न फिर इतने शिकवे-गिले होते
उदास लम्हों को हम ख़ुशगवार कर लेते
वो मुहब्बत के फूल गर कभी खिले होते
जहाँ की रौनकें गर तुझसे मेहरबां होतीं
इस ज़िंदगी के कुछ और सिलसिले होते
तेरे साझे में छोटा घर कभी तामीर हो जाता
तमन्ना कब थी ऐसी कि हमारे भी किले होते
हमने माना कि हम ख़ामोश रहे हैं अक्सर
वो तेरे ख़ूबसूरत लब भी कभी तो हिले होते
***श्रवण***
हमारे बीच न फिर इतने शिकवे-गिले होते
उदास लम्हों को हम ख़ुशगवार कर लेते
वो मुहब्बत के फूल गर कभी खिले होते
जहाँ की रौनकें गर तुझसे मेहरबां होतीं
इस ज़िंदगी के कुछ और सिलसिले होते
तेरे साझे में छोटा घर कभी तामीर हो जाता
तमन्ना कब थी ऐसी कि हमारे भी किले होते
हमने माना कि हम ख़ामोश रहे हैं अक्सर
वो तेरे ख़ूबसूरत लब भी कभी तो हिले होते
***श्रवण***
Friday, January 27, 2012
स्नेह की ख़ातिर समर्पण हो गया हूँ...
(एक)
नित तेरा प्रतिबिंब पाती रही आंखें
सुधियों में सहेज वही मधुर बातें
राह देखा किया हरदम सोच कर
यदि कहीं होते छिपे तुम लौट आते
(दो)
स्नेह की ख़ातिर समर्पण हो गया हूँ
पहले जड़ था अब मैं चेतन हो गया हूँ
पहले जलता था दीये-सा रात-दिन
प्यार की ज्वाला में अब खो गया हूँ
***श्रवण***
नित तेरा प्रतिबिंब पाती रही आंखें
सुधियों में सहेज वही मधुर बातें
राह देखा किया हरदम सोच कर
यदि कहीं होते छिपे तुम लौट आते
(दो)
स्नेह की ख़ातिर समर्पण हो गया हूँ
पहले जड़ था अब मैं चेतन हो गया हूँ
पहले जलता था दीये-सा रात-दिन
प्यार की ज्वाला में अब खो गया हूँ
***श्रवण***
Thursday, January 26, 2012
नयनों के द्वार खोले आ गयी सुबह..
(एक)
मधुर गीतों से भरा है प्यार,आओ झूम लें
नेह के इन निर्झरों को मन-प्राणों से चूम लें
अब न बैरागी रहेगा मन हमारा, प्रण करें
अनुरागों की बगिया में चलो फिर घूम लें
(दो)
नयनों के द्वार खोले आ गयी सुबह
सुधियों में प्यार घोले आ गयी सुबह
भूल कर सपनों की बातें,ऐ भोले मन
किरणों संग झूम ले, भूल जा विरह
***श्रवण***
मधुर गीतों से भरा है प्यार,आओ झूम लें
नेह के इन निर्झरों को मन-प्राणों से चूम लें
अब न बैरागी रहेगा मन हमारा, प्रण करें
अनुरागों की बगिया में चलो फिर घूम लें
(दो)
नयनों के द्वार खोले आ गयी सुबह
सुधियों में प्यार घोले आ गयी सुबह
भूल कर सपनों की बातें,ऐ भोले मन
किरणों संग झूम ले, भूल जा विरह
***श्रवण***
Wednesday, January 25, 2012
तमन्ना है तुम्हे फूलों की..
तमन्ना है तुम्हे फूलों की और मुझे काँटों से राहत
चलो मिल कर के ढूंढें तेरी-मेरी जिंदगी की चाहत
***श्रवण***
चलो मिल कर के ढूंढें तेरी-मेरी जिंदगी की चाहत
***श्रवण***
इस रात के लिए कोई भी चिराग नहीं...
सभी मित्रों को गणतंत्रदिवस की असीम शुभकामनाओं के साथ:
(एक)
हर घड़ी एक साल होती है
ज़िंदगी यूँ ही मुहाल होती है
तुमने जाने की कसम खाई है
आंखें रो-रो के लाल होती हैं.
(दो)
यह गोल चाँद ही तो है,कोई आग नहीं
इस रात के लिए कोई भी चिराग नहीं
तारे सब गुमसुम हैं,यूँ खोये-खोये से
नैना हैं जलरीते,हर घड़ी-पल रोये से
पलकों की सीपी में नींद ये लहक रही
दर्द भरा चेहरा ले रात भी सुबक रही
सपनों में खोये हैं सुधियों की राख लिये
अपनों में रोये हैं हम अँधेरा पाख लिये.
(तीन)
लो,तुम उदासी ले चले चेहरे पे बांधे
ठहरो,मैं आंखें लगा लूँ सजग प्यासी
देख लूँ जी भर बना एक अजनबी सा
क्या पता फिर लौट आये मधुर हंसी
***श्रवण***
(एक)
हर घड़ी एक साल होती है
ज़िंदगी यूँ ही मुहाल होती है
तुमने जाने की कसम खाई है
आंखें रो-रो के लाल होती हैं.
(दो)
यह गोल चाँद ही तो है,कोई आग नहीं
इस रात के लिए कोई भी चिराग नहीं
तारे सब गुमसुम हैं,यूँ खोये-खोये से
नैना हैं जलरीते,हर घड़ी-पल रोये से
पलकों की सीपी में नींद ये लहक रही
दर्द भरा चेहरा ले रात भी सुबक रही
सपनों में खोये हैं सुधियों की राख लिये
अपनों में रोये हैं हम अँधेरा पाख लिये.
(तीन)
लो,तुम उदासी ले चले चेहरे पे बांधे
ठहरो,मैं आंखें लगा लूँ सजग प्यासी
देख लूँ जी भर बना एक अजनबी सा
क्या पता फिर लौट आये मधुर हंसी
***श्रवण***
Tuesday, January 24, 2012
अब सियासत हमें बहलाने के लिए है
रोटी का कानून यहाँ भरमाने के लिए है
अपने अरमान ही बस जलाने के लिए हैं
रोशनी के राहबर कभी होते थे यहाँ पर
अब सियासत हमें बहलाने के लिए है.
***श्रवण***
अपने अरमान ही बस जलाने के लिए हैं
रोशनी के राहबर कभी होते थे यहाँ पर
अब सियासत हमें बहलाने के लिए है.
***श्रवण***
Monday, January 23, 2012
तुझसे ऊबे हुए इस गरीब-मन को
तुझसे ऊबे हुए इस गरीब-मन को
कितना बड़ा तूने ये आसरा दिया
तूने हमसे फिर किनारा कर लिया
जानेमन,फिर से तुम्हारा शुक्रिया
***श्रवण***
कितना बड़ा तूने ये आसरा दिया
तूने हमसे फिर किनारा कर लिया
जानेमन,फिर से तुम्हारा शुक्रिया
***श्रवण***
ज़िंदगी,लोग कहते हैं,बहुत बड़ी है..
(एक)
एक और सुबह आकर
चिपक गयी है
मेरी खिडकियों के ग्लास पर,
और मेरा मन
अटका हुआ है
पिछली रात की
करवटों में,सपनों में..
(दो)
दर्पण में अपनी परछाई देखकर
वे धीरे से मुस्कराए
और गर्व से बोले-
अर्रे यार! गज़ब..
यह तो अपना ही आदमी निकला..
(तीन)
ज़िंदगी,लोग कहते हैं,बहुत बड़ी है
पर यह न जाने कब से यूँ ही खड़ी है
चमकदार सिक्के-सी धूल में पड़ी है.
***श्रवण***
एक और सुबह आकर
चिपक गयी है
मेरी खिडकियों के ग्लास पर,
और मेरा मन
अटका हुआ है
पिछली रात की
करवटों में,सपनों में..
(दो)
दर्पण में अपनी परछाई देखकर
वे धीरे से मुस्कराए
और गर्व से बोले-
अर्रे यार! गज़ब..
यह तो अपना ही आदमी निकला..
(तीन)
ज़िंदगी,लोग कहते हैं,बहुत बड़ी है
पर यह न जाने कब से यूँ ही खड़ी है
चमकदार सिक्के-सी धूल में पड़ी है.
***श्रवण***
Saturday, January 21, 2012
दिल में रहती है इक मीठी कसक आठों पहर
दिल में रहती है इक मीठी कसक आठों पहर
उग रहा है आंगन में अब दीवारों का ज़हर
सुधियों में बहुत चुभता है वह वक़्त-ए-सफ़र
अपने ही घर में कहीं होता था वो अपना घर
***श्रवण***
उग रहा है आंगन में अब दीवारों का ज़हर
सुधियों में बहुत चुभता है वह वक़्त-ए-सफ़र
अपने ही घर में कहीं होता था वो अपना घर
***श्रवण***
ठिठुरन जब गहरी हो...
ठिठुरन जब गहरी हो,
अलाव तापते लोगों में-
न कोई पंजाबी न ईसाई,
न कोई अछूत न अस्पृश्य,
न कोई हिन्दू न मुसलमान होता है,
ठण्ड से मुक्ति तलाशता हर तन-मन
सिर्फ़ एक धर्मनिरपेक्ष
इंसान होता है.
***श्रवण***
अलाव तापते लोगों में-
न कोई पंजाबी न ईसाई,
न कोई अछूत न अस्पृश्य,
न कोई हिन्दू न मुसलमान होता है,
ठण्ड से मुक्ति तलाशता हर तन-मन
सिर्फ़ एक धर्मनिरपेक्ष
इंसान होता है.
***श्रवण***
Friday, January 20, 2012
लो,अनमनी-सी धूप की दिखने लगीं तनहाइयाँ!
लो,अनमनी-सी
धूप की
बिकने लगीं परछाइयाँ!
ऊष्मा के गहन रेशे
जी रहे हैं बंदिशों में
शीत के साम्राज्य में अब
सूर्य भी है गर्दिशों में
लो,अनमनी-सी
धूप की
दिखने लगीं तनहाइयाँ!
फिर से वैसे धुंध-कोहरे
और हवा के तीर-भाले
ठण्ड फिर खाने लगी है
धूप के गहरे निवाले
लो,अनमनी-सी
धूप की
होने लगीं रुसवाइयाँ !
***श्रवण***
धूप की
बिकने लगीं परछाइयाँ!
ऊष्मा के गहन रेशे
जी रहे हैं बंदिशों में
शीत के साम्राज्य में अब
सूर्य भी है गर्दिशों में
लो,अनमनी-सी
धूप की
दिखने लगीं तनहाइयाँ!
फिर से वैसे धुंध-कोहरे
और हवा के तीर-भाले
ठण्ड फिर खाने लगी है
धूप के गहरे निवाले
लो,अनमनी-सी
धूप की
होने लगीं रुसवाइयाँ !
***श्रवण***
ज़िंदगी में जब कभी रोशनी से साथ छूटता है
ज़िंदगी में जब कभी रोशनी से साथ छूटता है
अंधेरों का काफ़िला हमें बेरहमी से लूटता है
ख़्वाब अपने खो गए हैं इन्ही वीरानियों में
क्या कोई सपना किसी अपने से ऐसे रूठता है
***श्रवण***
अंधेरों का काफ़िला हमें बेरहमी से लूटता है
ख़्वाब अपने खो गए हैं इन्ही वीरानियों में
क्या कोई सपना किसी अपने से ऐसे रूठता है
***श्रवण***
Tuesday, January 17, 2012
कि तू बस इक याद बन कर रह गई
तेरी यादों की वो तासीर यूँ उल्टी पड़ी
कि तू बस इक याद बन कर रह गई
चाहा जो मुक़द्दर का सिकंदर बनना
तू इक फ़रियाद बन कर रह गई
***श्रवण***
कि तू बस इक याद बन कर रह गई
चाहा जो मुक़द्दर का सिकंदर बनना
तू इक फ़रियाद बन कर रह गई
***श्रवण***
Sunday, January 15, 2012
खेत पर खड़ा पुतला ज्यों...
(एक)
रूप-रंग चोखा है
नाम भी अनोखा है,
सावधान!-- कहा किसी ने
खेत पर खड़ा पुतला ज्यों
धोखा है...
धोखा है.
(दो)
दिल के हैं पत्थर पर
चेहरे बड़े भोले हैं,
चांदी के बर्तन में
तीखा ज़हर घोले हैं.
(तीन)
चिंता-चिता
दो जुड़वा बहनें,
तन-मन को सिर्फ़
जलाना जानती हैं,
ज़िंदगी भर
और ज़िंदगी के बाद.
***श्रवन***
रूप-रंग चोखा है
नाम भी अनोखा है,
सावधान!-- कहा किसी ने
खेत पर खड़ा पुतला ज्यों
धोखा है...
धोखा है.
(दो)
दिल के हैं पत्थर पर
चेहरे बड़े भोले हैं,
चांदी के बर्तन में
तीखा ज़हर घोले हैं.
(तीन)
चिंता-चिता
दो जुड़वा बहनें,
तन-मन को सिर्फ़
जलाना जानती हैं,
ज़िंदगी भर
और ज़िंदगी के बाद.
***श्रवन***
Saturday, January 14, 2012
बूंद-बूंद कर भर गया घड़ा...
(एक)
बेटी अब बड़ी हो गई
अपने पैरों पर खड़ी हो गई,
मां ने कहा बाप से-
यह भी परेशानी की
एक कड़ी हो गई.
(दो)
बूंद-बूंद कर भर गया घड़ा
देखते-देखते बेटा हो गया बड़ा,
मां-बाप को अब ज़िंदा जलाएगा-
उनके मरने पर
उन्हें आग भी लगाएगा.
(तीन)
वे देते नहीं भूखे को भी
कभी कोई दान,
पर अमर होने के क्रम में-
कर रहे हैं
मरणोपरांत दृष्टिदान.
***श्रवण***
बेटी अब बड़ी हो गई
अपने पैरों पर खड़ी हो गई,
मां ने कहा बाप से-
यह भी परेशानी की
एक कड़ी हो गई.
(दो)
बूंद-बूंद कर भर गया घड़ा
देखते-देखते बेटा हो गया बड़ा,
मां-बाप को अब ज़िंदा जलाएगा-
उनके मरने पर
उन्हें आग भी लगाएगा.
(तीन)
वे देते नहीं भूखे को भी
कभी कोई दान,
पर अमर होने के क्रम में-
कर रहे हैं
मरणोपरांत दृष्टिदान.
***श्रवण***
Friday, January 13, 2012
तू जो हंसती है...
तू जो हंसती है
तो बहार मुस्कराती है,
फ़िज़ाओं में जश्न होते हैं,
हम जो हंसते हैं तो
एक पत्ता भी
क्यों नहीं हिलता!
***श्रवण***
तो बहार मुस्कराती है,
फ़िज़ाओं में जश्न होते हैं,
हम जो हंसते हैं तो
एक पत्ता भी
क्यों नहीं हिलता!
***श्रवण***
आखिर ये दीवार क्यों नहीं टूटती है,यार!
उस तरफ तेरा प्यार,इस तरफ मैं बेकरार
बीच में फैली ये हरजाई ज़माने की दीवार
अब कैसे चलेगा,बोलो,स्नेह का कारोबार
आखिर ये दीवार क्यों नहीं टूटती है,यार!
***श्रवण***
बीच में फैली ये हरजाई ज़माने की दीवार
अब कैसे चलेगा,बोलो,स्नेह का कारोबार
आखिर ये दीवार क्यों नहीं टूटती है,यार!
***श्रवण***
हर चेहरा ख़ूबसूरत हर नाम सुन्दर है
(एक)
हर चेहरा ख़ूबसूरत
हर नाम सुन्दर है,
यह दुनिया भी क्या
सिर्फ़ मुखौटों का घर है?
(दो)
वह कैसे बंटा पाती
तुम्हारी उदासी,
वह तो ख़ुद थी
जन्म-जन्मांतरों की प्यासी.
(तीन)
माना कि सच्चाई में
बहुत दम है,
किन्तु आजकल वह
अपने-आप में ही
कितनी कम है!
***श्रवण***
हर चेहरा ख़ूबसूरत
हर नाम सुन्दर है,
यह दुनिया भी क्या
सिर्फ़ मुखौटों का घर है?
(दो)
वह कैसे बंटा पाती
तुम्हारी उदासी,
वह तो ख़ुद थी
जन्म-जन्मांतरों की प्यासी.
(तीन)
माना कि सच्चाई में
बहुत दम है,
किन्तु आजकल वह
अपने-आप में ही
कितनी कम है!
***श्रवण***
Thursday, January 12, 2012
शाम का इतिहास और वो अमिट यादें...
(एक)
तुम्हारी आँखों से थोड़ा शराबी तो हो लूँ
तुम्हारे ओठों से थोड़ा गुलाबी तो हो लूँ
ज़रा देर और तुम ठहर जाओ मेरे पास
कुछ तुम बोलो और कुछ मैं भी बोलूं.
(दो)
हमें देखे बिना वे बहुत बेक़रार हो गए
हाथ जो थामा तो प्यार ही प्यार हो गए
पहले होते थे वे मधुर बहार पर नाराज़
अब तो वे ख़ुद बहार ही बहार हो गए
(तीन)
शाम का इतिहास और वो अमिट यादें
प्यार का मधुमास और वे गीत-बातें
साथ सम्मुख बैठकर भी मौन हम-तुम
क्यों नहीं वे पल अछूते हम भूल पाते
***श्रवण***
तुम्हारी आँखों से थोड़ा शराबी तो हो लूँ
तुम्हारे ओठों से थोड़ा गुलाबी तो हो लूँ
ज़रा देर और तुम ठहर जाओ मेरे पास
कुछ तुम बोलो और कुछ मैं भी बोलूं.
(दो)
हमें देखे बिना वे बहुत बेक़रार हो गए
हाथ जो थामा तो प्यार ही प्यार हो गए
पहले होते थे वे मधुर बहार पर नाराज़
अब तो वे ख़ुद बहार ही बहार हो गए
(तीन)
शाम का इतिहास और वो अमिट यादें
प्यार का मधुमास और वे गीत-बातें
साथ सम्मुख बैठकर भी मौन हम-तुम
क्यों नहीं वे पल अछूते हम भूल पाते
***श्रवण***
Wednesday, January 11, 2012
शाम बनकर तेरी याद...
(एक) बंधन
सूरज ने लालिमा से
फिर भरी सुबह की मांग,
पहनाये किरणों के कंगन,
जन्म-जन्म के बंधन...
(दो) ज़िंदगी
थके पांव,
दौड़ती हुई एक सड़क
जो लौटना नहीं जानती,
अपने गाँव...
(तीन) अपनापन
शाम बनकर तेरी याद
फिर लौट आयी है
मेरे पास,किन्तु
बेहद उदास...
***श्रवण***
सूरज ने लालिमा से
फिर भरी सुबह की मांग,
पहनाये किरणों के कंगन,
जन्म-जन्म के बंधन...
(दो) ज़िंदगी
थके पांव,
दौड़ती हुई एक सड़क
जो लौटना नहीं जानती,
अपने गाँव...
(तीन) अपनापन
शाम बनकर तेरी याद
फिर लौट आयी है
मेरे पास,किन्तु
बेहद उदास...
***श्रवण***
Tuesday, January 10, 2012
तू है बेशक कलश तो हम भी यहाँ बुनियाद हैं...
तू है बेशक कलश तो हम भी यहाँ बुनियाद हैं
हमसे ही सदियों इमारत यहाँ पर आबाद है
रोटियों का दर्द लेकर जी रही उस कौम को
कब तलक कहते रहोगे,व्यर्थ की फ़रियाद है
और कितना तुम भरोगे गर्भगृह को इस तरह
जय तुम्हारी हो न हो पर देश तो बर्बाद है
तुमने जो चाहा यहाँ वो अपने नाम कर लिया
और झांसे हमको मिलते,यह वतन आज़ाद है
सर उठाने लग गई हैं अब मशालें हर तरफ
अब न सम्हले तो यहाँ पर सबकी मुर्दाबाद है
***श्रवण***
हमसे ही सदियों इमारत यहाँ पर आबाद है
रोटियों का दर्द लेकर जी रही उस कौम को
कब तलक कहते रहोगे,व्यर्थ की फ़रियाद है
और कितना तुम भरोगे गर्भगृह को इस तरह
जय तुम्हारी हो न हो पर देश तो बर्बाद है
तुमने जो चाहा यहाँ वो अपने नाम कर लिया
और झांसे हमको मिलते,यह वतन आज़ाद है
सर उठाने लग गई हैं अब मशालें हर तरफ
अब न सम्हले तो यहाँ पर सबकी मुर्दाबाद है
***श्रवण***
शहर के आईने भी हो गए हैं खुदगर्ज़ इतने...
शहर के आईने भी हो गए हैं खुदगर्ज़ इतने
कि हमारे अक्स की क़ीमत हमसे मांगते हैं
पत्थरों से सर फोड़ना कब छोड़ा था हमने
फिर भी ये पत्थर हमें शीशा ही मानते हैं
***श्रवण***
कि हमारे अक्स की क़ीमत हमसे मांगते हैं
पत्थरों से सर फोड़ना कब छोड़ा था हमने
फिर भी ये पत्थर हमें शीशा ही मानते हैं
***श्रवण***
Monday, January 9, 2012
अब हमारे यूँ बहके हुए ये अंदाज़ रोकते हो...
दबे-कुचले लोगों की मुखर आवाज़ रोकते हो
उड़ने को बेताब परिंदों की परवाज़ रोकते हो
तुम पर कब होता था गिड़गिड़ाने का असर
अब हमारे यूँ बहके हुए ये अंदाज़ रोकते हो
***श्रवण***
उड़ने को बेताब परिंदों की परवाज़ रोकते हो
तुम पर कब होता था गिड़गिड़ाने का असर
अब हमारे यूँ बहके हुए ये अंदाज़ रोकते हो
***श्रवण***
ये दिल है मेरा कि कोई सूना मज़ार है...
ये दिल है मेरा कि कोई सूना मज़ार है
न तो रोशनी कोई,न जश्न यहाँ होते हैं
मुझको अपना कहने वाले आकर देख
तन्हाई में अक्सर सारे दर्द जवां होते हैं
***श्रवन***
न तो रोशनी कोई,न जश्न यहाँ होते हैं
मुझको अपना कहने वाले आकर देख
तन्हाई में अक्सर सारे दर्द जवां होते हैं
***श्रवन***
Sunday, January 8, 2012
ऐसे में मेरा मन गुनगुना होने लगा है...
मौसम का रुख़ अनमना होने लगा है
कोहरा फिर से यहाँ घना होने लगा है
अब तो बदल अपना मिजाज़,ऐ दोस्त
ऐसे में मेरा मन गुनगुना होने लगा है
***श्रवण***
कोहरा फिर से यहाँ घना होने लगा है
अब तो बदल अपना मिजाज़,ऐ दोस्त
ऐसे में मेरा मन गुनगुना होने लगा है
***श्रवण***
तबस्सुम बिखेरते हुए...
वो हमारी जानिब
तबस्सुम बिखेरते हुए
गुज़र गए,
और हम--
उनकी हंसी के टुकड़ों को
ज़मीन से
बीनते रह गए...
***श्रवण***
तबस्सुम बिखेरते हुए
गुज़र गए,
और हम--
उनकी हंसी के टुकड़ों को
ज़मीन से
बीनते रह गए...
***श्रवण***
Saturday, January 7, 2012
जो अपनी प्यास लेकर के समंदर तक गए होते...
जो तुझसे प्यार की ताज़ीर मुक़र्रर हो गई होती
तो हमने ज़ुर्म का इक़बाल कब का कर लिया होता
जो अपनी प्यास लेकर के समंदर तक गए होते
तो दिल को एक नखलिस्तान जैसा भर लिया होता
***श्रवण*** (ताज़ीर ...सज़ा)
तो हमने ज़ुर्म का इक़बाल कब का कर लिया होता
जो अपनी प्यास लेकर के समंदर तक गए होते
तो दिल को एक नखलिस्तान जैसा भर लिया होता
***श्रवण*** (ताज़ीर ...सज़ा)
हर अँधेरे के लिए बस,दिल के चिराग थे...
ज़िंदगी के वास्ते सब मुश्किलें मंजूर थीं
हर सियाही के लिए ये रोशनी मजबूर थी
गम में हंसते ही रहे,वो दिल के दाग थे
हर अँधेरे के लिए बस,दिल के चिराग थे...
***श्रवण***
हर सियाही के लिए ये रोशनी मजबूर थी
गम में हंसते ही रहे,वो दिल के दाग थे
हर अँधेरे के लिए बस,दिल के चिराग थे...
***श्रवण***
Friday, January 6, 2012
तुमने जाने कि कसम खाई है जबसे...
अब तसल्ली के लिए कोई पैगाम नहीं
मुश्किलें इतनी बढ़ीं हैं कि आराम नहीं
तुमने जाने कि कसम खाई है जबसे
इससे बड़ा कोई मातम-कोहराम नहीं
***श्रवण***
मुश्किलें इतनी बढ़ीं हैं कि आराम नहीं
तुमने जाने कि कसम खाई है जबसे
इससे बड़ा कोई मातम-कोहराम नहीं
***श्रवण***
Thursday, January 5, 2012
अपनी आँखों में तेरा आकार मुझको चाहिए
अपनी आँखों में तेरा आकार मुझको चाहिए
प्यार अपना दो न दो,अधिकार मुझको चाहिए
गर तुम्हे मैं याद आऊं,भूलने का हक़ तुम्हारा
अपने सपनों में तेरा आधार मुझको चाहिए
***श्रवण***
प्यार अपना दो न दो,अधिकार मुझको चाहिए
गर तुम्हे मैं याद आऊं,भूलने का हक़ तुम्हारा
अपने सपनों में तेरा आधार मुझको चाहिए
***श्रवण***
Wednesday, January 4, 2012
पत्थरों के शहर में अब कुछ न कहो...
पत्थरों के शहर में अब कुछ न कहो
तसल्ली का ज़हर पियो,ख़ामोश रहो
रूठा है हर दरख़्त यहाँ अपने साये से
नारों और वादों में डूबो, मदहोश रहो
***श्रवण***
तसल्ली का ज़हर पियो,ख़ामोश रहो
रूठा है हर दरख़्त यहाँ अपने साये से
नारों और वादों में डूबो, मदहोश रहो
***श्रवण***
किरणों से नहाती चिड़िया...
इस खिली धूप में किरणों से नहाती चिड़िया
ऐसा अहसास है कि जैसे हम भी ज़िन्दा हैं
***श्रवण***
ऐसा अहसास है कि जैसे हम भी ज़िन्दा हैं
***श्रवण***
Tuesday, January 3, 2012
रसिक भौरों से जरा संकोच भी...
रूप-यौवन नग्न है
उन्मत्त है यह अप्सरा,
क्यों उतर आयी स्वर्ग से धरा पर?,
गीत भी है,नृत्य भी और लोच
रसिक भौरों से जरा संकोच भी,
मीन लोचन रसभरे दो संग हैं,
आज निश्चय ही समझ लो-
किसी ब्रह्मचारी की तपस्या
भंग है...
***श्रवण***
उन्मत्त है यह अप्सरा,
क्यों उतर आयी स्वर्ग से धरा पर?,
गीत भी है,नृत्य भी और लोच
रसिक भौरों से जरा संकोच भी,
मीन लोचन रसभरे दो संग हैं,
आज निश्चय ही समझ लो-
किसी ब्रह्मचारी की तपस्या
भंग है...
***श्रवण***
बहुत दुखते हैं अपने कन्धों पर टूटे पर...
सड़कों पर पथराव व शोरगुल देखकर
याद बहुत आया हमें वो अपना शहर
उड़ने की चाह लिए नीला विस्तार देख
बहुत दुखते हैं अपने कन्धों पर टूटे पर
***श्रवण***
याद बहुत आया हमें वो अपना शहर
उड़ने की चाह लिए नीला विस्तार देख
बहुत दुखते हैं अपने कन्धों पर टूटे पर
***श्रवण***
Monday, January 2, 2012
सबके सीने में अभी तपिश बहुत बाकी है
सबके सीने में अभी तपिश बहुत बाकी है
उनके मशालों के लिए आग बांटनी होगी
जहाँ दीवारें नहीं,उनके लिए छत के पयाम
ये खाइयाँ भी वगावत से पाटनी होंगी
***श्रवण***...
उनके मशालों के लिए आग बांटनी होगी
जहाँ दीवारें नहीं,उनके लिए छत के पयाम
ये खाइयाँ भी वगावत से पाटनी होंगी
***श्रवण***...
Sunday, January 1, 2012
आखिर हमारे होने का किसी को अहसास तो हो...
(एक)
ज़िंदगी में हम कभी यूँ इतने परेशान तो न थे
ग़मों का सहारा था,खुशियों के सामान तो न थे
(दो)
आखिर हमारे होने का किसी को अहसास तो हो
बेशक नज़रों से रहे दूर पर दिल के पास तो हो
(तीन)
बेहद रो रही थी एक औरत रात को गुमसुम
जो पूछा कौन है,तो वो अपनी ज़िंदगी निकली
(चार)
फिरतें हैं हाथों में लिए अपने दिल के टुकड़ों को
लूटा है फिर उसी ने मुहब्बत का नाम ले कर
***श्रवण***
ज़िंदगी में हम कभी यूँ इतने परेशान तो न थे
ग़मों का सहारा था,खुशियों के सामान तो न थे
(दो)
आखिर हमारे होने का किसी को अहसास तो हो
बेशक नज़रों से रहे दूर पर दिल के पास तो हो
(तीन)
बेहद रो रही थी एक औरत रात को गुमसुम
जो पूछा कौन है,तो वो अपनी ज़िंदगी निकली
(चार)
फिरतें हैं हाथों में लिए अपने दिल के टुकड़ों को
लूटा है फिर उसी ने मुहब्बत का नाम ले कर
***श्रवण***
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