Wednesday, January 4, 2012

पत्थरों के शहर में अब कुछ न कहो...

पत्थरों के शहर में अब कुछ न कहो
तसल्ली का ज़हर पियो,ख़ामोश रहो
रूठा है हर दरख़्त यहाँ अपने साये से
नारों और वादों में डूबो, मदहोश रहो
***श्रवण***

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