Monday, January 23, 2012

ज़िंदगी,लोग कहते हैं,बहुत बड़ी है..

(एक)
एक और सुबह आकर
चिपक गयी है
मेरी खिडकियों के ग्लास पर,
और मेरा मन
अटका हुआ है
पिछली रात की
करवटों में,सपनों में..

(दो)
दर्पण में अपनी परछाई देखकर
वे धीरे से मुस्कराए
और गर्व से बोले-
अर्रे यार! गज़ब..
यह तो अपना ही आदमी निकला..

(तीन)
ज़िंदगी,लोग कहते हैं,बहुत बड़ी है
पर यह न जाने कब से यूँ ही खड़ी है
चमकदार सिक्के-सी धूल में पड़ी है.
***श्रवण***

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