Wednesday, January 25, 2012

इस रात के लिए कोई भी चिराग नहीं...

सभी मित्रों को गणतंत्रदिवस की असीम शुभकामनाओं के साथ:

(एक)
हर घड़ी एक साल होती है
ज़िंदगी यूँ ही मुहाल होती है
तुमने जाने की कसम खाई है
आंखें रो-रो के लाल होती हैं.

(दो)
यह गोल चाँद ही तो है,कोई आग नहीं
इस रात के लिए कोई भी चिराग नहीं
तारे सब गुमसुम हैं,यूँ खोये-खोये से
नैना हैं जलरीते,हर घड़ी-पल रोये से
पलकों की सीपी में नींद ये लहक रही
दर्द भरा चेहरा ले रात भी सुबक रही
सपनों में खोये हैं सुधियों की राख लिये
अपनों में रोये हैं हम अँधेरा पाख लिये.

(तीन)
लो,तुम उदासी ले चले चेहरे पे बांधे
ठहरो,मैं आंखें लगा लूँ सजग प्यासी
देख लूँ जी भर बना एक अजनबी सा
क्या पता फिर लौट आये मधुर हंसी
***श्रवण***

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