मेरे पलाशवन
Tuesday, January 10, 2012
शहर के आईने भी हो गए हैं खुदगर्ज़ इतने...
शहर के आईने भी हो गए हैं खुदगर्ज़ इतने
कि हमारे अक्स की क़ीमत हमसे मांगते हैं
पत्थरों से सर फोड़ना कब छोड़ा था हमने
फिर भी ये पत्थर हमें शीशा ही मानते हैं
***श्रवण***
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