(एक) बंधन
सूरज ने लालिमा से
फिर भरी सुबह की मांग,
पहनाये किरणों के कंगन,
जन्म-जन्म के बंधन...
(दो) ज़िंदगी
थके पांव,
दौड़ती हुई एक सड़क
जो लौटना नहीं जानती,
अपने गाँव...
(तीन) अपनापन
शाम बनकर तेरी याद
फिर लौट आयी है
मेरे पास,किन्तु
बेहद उदास...
***श्रवण***
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