Friday, January 20, 2012

लो,अनमनी-सी धूप की दिखने लगीं तनहाइयाँ!

लो,अनमनी-सी
धूप की
बिकने लगीं परछाइयाँ!

ऊष्मा के गहन रेशे
जी रहे हैं बंदिशों में
शीत के साम्राज्य में अब
सूर्य भी है गर्दिशों में

लो,अनमनी-सी
धूप की
दिखने लगीं तनहाइयाँ!

फिर से वैसे धुंध-कोहरे
और हवा के तीर-भाले
ठण्ड फिर खाने लगी है
धूप के गहरे निवाले

लो,अनमनी-सी
धूप की
होने लगीं रुसवाइयाँ !
***श्रवण***

No comments:

Post a Comment