लो,अनमनी-सी
धूप की
बिकने लगीं परछाइयाँ!
ऊष्मा के गहन रेशे
जी रहे हैं बंदिशों में
शीत के साम्राज्य में अब
सूर्य भी है गर्दिशों में
लो,अनमनी-सी
धूप की
दिखने लगीं तनहाइयाँ!
फिर से वैसे धुंध-कोहरे
और हवा के तीर-भाले
ठण्ड फिर खाने लगी है
धूप के गहरे निवाले
लो,अनमनी-सी
धूप की
होने लगीं रुसवाइयाँ !
***श्रवण***
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