Friday, January 20, 2012

ज़िंदगी में जब कभी रोशनी से साथ छूटता है

ज़िंदगी में जब कभी रोशनी से साथ छूटता है
अंधेरों का काफ़िला हमें बेरहमी से लूटता है
ख़्वाब अपने खो गए हैं इन्ही वीरानियों में
क्या कोई सपना किसी अपने से ऐसे रूठता है
***श्रवण***

No comments:

Post a Comment