Sunday, June 3, 2012

सुधियों के अमलतास: ओ हरजाई,मानसून!

सुधियों के अमलतास: ओ हरजाई,मानसून!: न्यूटन के ज़माने में सेब ऊपर से नीचे गिरा करते थे.आज भी स्थिति वैसी ही है.कभी हवाई जहाज के पहिये आसमान से गिर पड़ते हैं.कभी पूरा का पूरा जहाज...

Wednesday, May 23, 2012

मुखौटों के यहाँ कारोबारी से लगे हैं लोग भी

मुखौटों के यहाँ कारोबारी से लगे हैं लोग भी
अब यहाँ पर इश्तिहारी से लगे हैं लोग भी

इस शहर के नाम कर दें फिर कोई वीरानियाँ
बेगार की अब पल्लेदारी से लगे हैं लोग भी

टूटने औ बिखरने का अब न कोई ज़िक्र छेड़ो
मुफलिसों की गमगुसारी से लगे हैं लोग भी

कौन देगा साथ,हम किससे यहाँ उम्मीद बांधें
ज़ुल्म की इक थानेदारी से लगे हैं लोग भी

भूख की इन बस्तियों में प्यास लेकर जी रहे
झूठे वादों की ख़ुमारी से लगे हैं लोग भी

जिन पे था दारोमदार,आज के इस दौर में
भिखारियों की रेज़गारी से लगे हैं लोग भी

देश के हालात पर फिर कौन रोयेगा 'श्रवण'
अब यहाँ पर गैरज़िम्मेदारी से लगे हैं लोग भी
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Thursday, March 29, 2012

मेरे कन्धों से लग कर जो कभी रोता था ज़ार-ज़ार

बुतों को तू अगर छू ले,तो उनमें जान आ जाए
न कर मुझसे यही उम्मीद, कोई बुत नहीं हूँ मैं

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मेरी मुश्किल कि मैं ख़ुद को छिपाकर रख नहीं सकता
तेरी फ़ितरत किसी को मंच तक आने नहीं देती

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मेरे कन्धों से लग कर जो कभी रोता था ज़ार-ज़ार
वही करने लगा है अब मेरे रोने का, यारो, इंतज़ार

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खिजाओं ने बहारों को किराये पर लिया होगा
तभी तो सारे मौसम एक से मालूम होते हैं

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'' मेरे ज़ख्मों पे छिड़कते हैं नमक जी भर कर
और कहते हैं कि नमक में आयोडीन भी है.''
हसीनों पर फ़िदा होना हो गर,दरियाफ्त कर लेना
कि वे बस ज़िस्म हैं या दिल भी है उनके बदन में

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मेरे जज़्बात को तमग़े मिले रुसवाइयों के
हम अपने दर्द को ख़ुशियों की सज़ा दे न सके

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उनके ओठों से हंसी के घने फुहारे फूटते हैं,
जैसे रुक-रुक कर पानी के फव्वारे फूटते हैं.

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''ऐ नाज़नीनों, अपनी निगाहों से जुबां का काम करो,
और अपनी कैंची-सी जीभ से कहो कि आराम करो.''

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ज़िन्दगी ज़ंजीर में जकड़ी हुई जंजाल-सी
जाल को काटो मगर ये ज़िन्दगी कटती नहीं

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किस तरह अब कोई उनका दिल चुराए,दोस्तो

(क) किस तरह अब कोई उनका दिल चुराए,दोस्तो
रख दिया है दिल सभी ने,बैंक के उन लाकरों में
(ख) किडनियों के दाम अच्छे मिल रहे हैं, साथियों
कौन अहमक फिर यहाँ पर दिल चुराने जायेगा
(ग) दिल की नीलामी में यूँ तो बोलियाँ थीं लाख की
ले गया ज़ालिम मेरा दिल कौड़ियों के मोल पर
(घ) मैंने पूछा किस तरह तोड़ोगे मेरा दिल,सनम
हंसके वो मुझको नया बेलन दिखाने लग गए
(च) दिल को बच्चा समझकर वे ले गए थे साथ में
बाल-मज़दूरी का ज़ुर्म उन पे साबित हो चुका है
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Wednesday, March 14, 2012

सभ्यता करने लगी है पत्थरों के कारोबार...

पाषाण-युग के नाम भेजो,दोस्तो,यह समाचार
सभ्यता करने लगी है पत्थरों के कारोबार

बुतशिकन लिखने लगे हैं बुतपरस्ती पर किताबें
ज़िन्दगी के नाम मिलते दर्द के शुभ समाचार

पीढियां अब लिख न पाएंगी कभी इतिहास अपना
हो गए रेहन समय को, जिन पे था दारोमदार

पत्थरों के शहर में मिलती नहीं हैं मंज़िलें
चाहतों के नाम लिक्खे भटकनों के गमगुसार

मन के मंदिर में जिन्हें हम देवता कहते रहे
पत्थरों की कौम को करते रहे वो शर्मशार

***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Monday, March 5, 2012

जब भी गुज़रा हूँ यहां मैं घनी तनहाइयों से
मेरा यह दर्द ही हमदर्द बनके साथ रहा.

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फिर तुम्हारी याद आयी-
पोर-पोर महके अमराई,
मन आंगन में
कूके कोयल
चहक रही तनहाई...
फिर तुम्हारी याद आयी

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ये मेरे ओंठ पत्थर के मुझे ख़ामोश रखते हैं

उनकी आँखों में रज़ामंदी तो हमने देख ली है
अब ज़रा अपने भी दिल से,उसकी मर्ज़ी जान लूं

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शमां की मानिंद हम रात भर जलते रहे
मोम का पर्याय बन ख़्वाब भी गलते रहे
वो ज़माने भर की पीड़ा मेहरबां हम पर रही
दर्द के दानव हमारे दिल में यूँ पलते रहे

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बहुत भारी पड़ा है हम पे अपना ही मुकद्दर
किसी मुफ़लिस सी है अब ज़िंदगी, यारो
हमें नफ़रत नहीं,अपना ज़रा सा प्यार देकर
हमारी भी यहाँ बिखरी हुई दुनिया संवारो

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मैं कोई बुत बना फिरता हूँ पत्थर के शहर में
ये मेरे ओंठ पत्थर के मुझे ख़ामोश रखते हैं

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तुम ही समझो हम यहां बर्बाद या आबाद हैं
ज़िंदगी की क़ैद में पर हम बहुत आज़ाद हैं

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छिपायें किस तरह चेहरा यहाँ

अंधेरों का जशन और तू भी शामिल हो गया उसमे
किया क्यों था उजालों से यहाँ इकरार चाहत का ?

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छिपायें किस तरह चेहरा यहाँ
बहुत बेबाक हैं अब आईने भी

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हमारे बीच ये वर्षों से जमी ख़ामोशी
बर्फ के साथ चलो एक बार पिघलें हम

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यहाँ अमृत वगैरह की कभी उम्मीद मत करना
हलाहल ही मिलेगा तुमको गर कुछ भी मिलेगा

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हाले-ए-दिल तेरा रक़ीबों को बताने के लिए
हाले-ए-दिल अपना सुनाता हूँ तुझे तफ़सील से

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कुछ इस दिल ने कहा...

कभी ग़म से जो तेरा दिल यहां लबरेज़ रहता हो
समझ लेना कि अब खुशियां भी दस्तक देने वाली हैं

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चाहा था मैंने डूबना उन झील सी आँखों में
उकता के तूने कह दिया जा डूब मर समंदर में

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दर्द के बदले ख़ुशी मिलने लगी है आज कल
दूसरों के दर्द से ख़ुशहाल हैं बस्ती के लोग

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मेरे ज़ख्मों पे जो गुज़रा वो हंसी मंज़र न पूछ
वक़्त तो भरता रहा और वो हरा करता रहा

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हाय ! मेरे दिल पे उनका वो यकीं जाता रहा
कह रहे हैं लेके आओ, एफिडेविट प्यार का

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इधर हालात बद से और बदतर होते जाते हैं
अब उम्मीद किस उम्मीद पर ज़िंदा रहे यहाँ

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उनकी ख़ूबी से अभी तक सब यहाँ अनजान हैं

उनकी ख़ूबी से अभी तक सब यहाँ अनजान हैं
कि जितने गहरे दर्द उतनी ही घनी मुस्कान है

आंसुओं को पी के भी बुझती नहीं है प्यास इनकी
ये सियासत के सितम की दु:खद-सी पहचान हैं

हम-वतन और हम-जबां होकर भी हमसे दूर हैं
क्यों यहां इनके लिए ख़ामोश हर फ़रमान है ?

हैसियत कोई भी हो पर ज़िंदगी तो ज़िंदगी है
क्या करें, इस तथ्य से ख़ाली हुआ संविधान है

वतन की तस्वीर में, वो रंग भर कर होगा क्या
जब तलक लोगो के सब कुचले हुए अरमान हैं
***श्रवण*** (०५ फरवरी,२०१२)

Sunday, February 19, 2012

हिमाक़त हो गई है

ये नींद आंखों से मेरी क्यूं दूर हो गयी ?
अबे ! गोली इक नींद की खा तो सही !

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क्यों बार-बार मेरा रास्ता काटता है तू ?
ये काम बिल्ली को करने दे न,यार !

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यह हिमाक़त हो गई है मुझसे मेरी दिलरुबा
गिर पड़ा हूँ मैं तेरी रुखसार की उन खाईयों में
***श्रवण***

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कहीं उलझ न जाये फिर से ज़िंदगी, यारो
उनके बालों के ये ख़म मुझको दुआ देते हैं
***श्रवण***

मगर ही कहते हैं

वो चाहे ग़म के हों या ख़ुशी के आंसू
यहाँ के लोग मुझे मगर ही कहते हैं
***श्रवण***

दस्तक देने वाली हैं

कभी ग़म से जो तेरा दिल यहां लबरेज़ रहता हो
समझ लेना कि अब खुशियां भी दस्तक देने वाली हैं
***श्रवण***

चाहा था मैंने डूबना

चाहा था मैंने डूबना उन झील सी आँखों में
उकता के तूने कह दिया जा डूब मर समंदर में
***श्रवण***

दूसरों के दर्द से

दर्द के बदले ख़ुशी मिलने लगी है आज कल
दूसरों के दर्द से ख़ुशहाल हैं बस्ती के लोग
***श्रवण***

वो हरा करता रहा

मेरे ज़ख्मों पे जो गुज़रा वो हंसी मंज़र न पूछ
वक़्त तो भरता रहा और वो हरा करता रहा
***श्रवण***

उनका वो यकीं

हाय ! मेरे दिल पे उनका वो यकीं जाता रहा
कह रहे हैं लेके आओ, एफिडेविट प्यार का
***श्रवण***

किस उम्मीद पर

इधर हालात बद से और बदतर होते जाते हैं
अब उम्मीद किस उम्मीद पर ज़िंदा रहे यहाँ
***श्रवण***

इकरार चाहत का

अंधेरों का जशन और तू भी शामिल हो गया उसमे
किया क्यों था उजालों से यहाँ इकरार चाहत का ?
***श्रवण***

Saturday, February 18, 2012

बहुत हैं हम मगर इतने भी हम तो बेवफ़ा नहीं

कि उनके मुंह पे कैसे कह दें,उनमे भी वफ़ा नहीं
बहुत हैं हम मगर इतने भी हम तो बेवफ़ा नहीं

उधर हालात बद से और बदतर हो रहे दिन-रात
तआज्जुब ये कि अपने आप पे हम भी ख़फा नहीं

यहाँ बेख़ौफ़ हो कर जिसका चाहे दिल चुराइए
इधर कानून में इस ज़ुर्म की कोई दफ़ा नहीं

ज़माने के मुक़ाबिल हम खड़े हो जाएँ तो लेकिन
हिसाबी दिल मेरा सोचे कि सौदे में नफ़ा नहीं

हवाले कर दिया ख़ुद को तेरे और बाद में जाना
जफ़ा करने के लायक भी कहीं तुझमे जफ़ा नहीं
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Monday, February 13, 2012

दुःख को रेहन स्वप्न हमारे...

जिंदगी की दौड़ में
हम बहुत पीछे छूटे हैं,
हम नहीं टूटे हैं
हमारे ख़्वाब टूटे हैं.

रोशनी के हाथों में बेड़ियां
अंधेरों ने खोले हैं यातनाघर
जी रहे विषपायी पल मानो
जीतना हो जीवन का महासमर

क्या खोया-क्या पाया
मत कहो,करम फूटे हैं,
प्रायश्चित की हवेली में
हमारे दावे झूठे हैं.

कभी न पाई मंजिल लेकिन
भटक रहे मन के बंजारे
पीड़ा के पर्वत लांघे हैं
दुःख को रेहन स्वप्न हमारे

कहना है कितना कुछ
पर बंदिश के खूंटे हैं,
समय के सिपाहियों ने
हमारे पल-छिन लूटे हैं.
***श्रवण***

Thursday, February 9, 2012

फिर उठा तूफान क्या हम आज़माना छोड़ दें

फिर उठा तूफ़ान क्या हम आज़माना छोड़ दें
बिजलियों के डर से क्योंकर घर बनाना छोड़ दें

दर्द-ए-दरिया में हमारी नाव फिर से जा फंसी
दूर है साहिल तो क्यों हम मुस्कुराना छोड़ दें

हर तरफ आतंक है छाया हुआ इस दौर में
काश! हम अंदाज़ अपना वहशियाना छोड़ दें

प्यार में गाफ़िल हुए,रुसवाइयों का डर कहाँ
क्यों भला हम इश्क में लुटना-लुटाना छोड़ दें

हमसे उनको है अदावत,उनकी मर्ज़ी,क्या करें!
कैसे हम यूँ दिल की रस्मों को निभाना छोड़ दें

अब यहाँ पर ज़िंदगी का रुख़ बदलना चाहिए
नक़ली खुशियों का यहां,आओ बहाना छोड़ दें

गर बदलना चाहते हैं आज के हालात को
हम आईनों से बेहिचक आंखें चुराना छोड़ दें
***श्रवण***

जितना ऊँचा क़द,हैं उतने ही छोटे लोग

जितना ऊँचा क़द,हैं उतने ही छोटे लोग
लुढ़क रहे हर ओर,बिन पेंदी के लोटे लोग

शरम-हया की बातें सारी बेमानी लगतीं
नक़ली चमक दिखाते अपनी खोटे लोग
***श्रवण***

Wednesday, February 8, 2012

पत्थर का ज़िगर हो तो मन मोम का रखना

पत्थर का ज़िगर हो तो मन मोम का रखना
कभी रोम में रहना तो रहन रोम का रखना
अपने को गर बचाना हो अहम् के घमंड से
तो ज़िंदगी में अपना वज़न फोम का रखना
***श्रवण***

राहबर सोये पड़े हैं सियासत की सेजों में

राहबर सोये पड़े हैं सियासत की सेजों में
ज़िंदगी है क़ैद यहाँ दर्द के दस्तावेज़ों में

परचम लहराया चुनाव का लो भेड़ियों ने
मगर ने ऑंखें गड़ाईं बन्दर के कालेजों में

खुले आम लूट लिया तुमने इस देश को
हमको उलझाये रखा व्यर्थ के परहेजों में

वोट है कुंवारी कन्या,दूल्हों से प्रत्याशी
लुटा दिया वोटर ने जनमत दहेजों में

निगला है फिर से दूध की मक्खियों को
जनता का रुख़ ऐसा कैसे घुसे भेजों में
***श्रवण***

लोग छोटे-छोटे घरों में रहते हैं...

लोग छोटे-छोटे घरों में रहते हैं
कुछ भी छुपाने की वज़ह नहीं है
ज़िंदगी को बचाना है बेहद ज़रूरी
चरित्र के लिए कहीं जगह नहीं है
***श्रवण***

तेरी सोहबत ने बदले हैं...

तेरी सोहबत ने बदले हैं यहाँ प्यार के मानी
वफ़ा को ले गया तू बेवफ़ाई के कगारों तक
***श्रवण***

ख़लिश हो या कि रंजिश...

ख़लिश हो या कि रंजिश,ये तेरी ही खुदाई है
तेरे नाख़ून की तासीर इन ज़ख्मों ने बताई है
***श्रवण***

दोनों का बुरा हाल हुआ...

दोनों का बुरा हाल हुआ
तेरे इश्क में,
एक रो रहा बिछड़कर
एक जुड़के रो रहा.
***श्रवण***

मेरे दिल को जला-जला

न सही मैं मगर दिल तो मेरा कुछ काम आया है
मेरे दिल को जला-जला कर उसने रोटियां सेंकीं
सुप्रभात..
***श्रवण***

उनकी ख़ूबी से अभी...

उनकी ख़ूबी से अभी तक सब यहाँ अनजान हैं
कि जितने गहरे दर्द उतनी ही घनी मुस्कान है
***श्रवण***

तेरे सपनों में मुझे थोड़ी जगह दे देना

तेरी तनहाइयों का गर ज़िम्मेदार हूँ मैं
अब भी आ जा कि तेरा इंतज़ार हूँ मैं

मन के आँगन में तेरा प्यार गवाही देगा
तेरे दिल की चाहतों का गुनहगार हूँ मैं

दर्द अंगारा बन के हमको रोशनी देगा
तेरे जख्मों से मगर खूब शर्मसार हूँ मैं

तेरे सपनों में मुझे थोड़ी जगह दे देना
हिस्सा बनना है मुझे तेरा,बेक़रार हूँ मैं
***श्रवण***

इस शाम से पहले का शमां डूब रहा है

इस शाम से पहले का शमां डूब रहा है
ये मन तन्हां-तन्हां क्यों डूब रहा है

पश्चिम में डूबता हुआ कहता है सूरज
मैं यहाँ डूब रहा हूँ,तू वहां डूब रहा है
***श्रवण***

फिर उतर आइ कहीं से..

फिर उतर आइ कहीं से
ये उदास-सी शाम,
फिर तेरी याद की शहनाई बजी,
फिर कहीं खिल उठे ख़यालों में
तेरी मुस्कुराहटों के फूल,
फिर कहीं कांपती लहरों से उठे
शाम के शोक गीत,
फिर कहीं रात हुई,
दर्द के जल उठे चिराग.
***श्रवण***

Wednesday, February 1, 2012

आईना उनको दिखाया तो बुरा मान गए...

वो जो हमको देते थे नसीहतें दिन-रात
आईना उनको दिखाया तो बुरा मान गए

उजले कपड़ों में जो ख़ुद को यूँ छिपाए थे
उन सफ़ेदपोशों को हम भी पहचान गए

ज़िंदगी इस क़दर उलझी कि यहाँ,यारो
बहुत सम्हाला पर वो सारे अरमान गए

जिसने आवाज़ उठाई जुल्मों के ख़िलाफ़
ऐसे हर सख्श पर हम यहाँ कुर्बान गए

जिन निगाहों से हम घायल हुए बार-बार
लगता है उन नज़रों के वे तीर-कमान गए
***श्रवण***

जाती शीत-आती गर्मी,मनभावन यह संधिकाल है

जाती शीत-आती गर्मी,मनभावन यह संधिकाल है
पुरवईया के झोंकों में बस तेरा ही ख़्वाबो-ख़याल है
मीठे-मीठे रिश्तों सी यह गुनगुन लगती धूप खिली
रोको मत बिरही मन को,आओ भी, दिल का सवाल है!
***श्रवण***...

Tuesday, January 31, 2012

पीड़ा को आस्तीन के सापों सा न पालिए...

दर्द सांसों में बसा हो तो उसे निकालिए
पीड़ा को आस्तीन के सापों सा न पालिए
इतनी ख़ुशियाँ हैं यहाँ ज़िंदगी में,यारो
उन्हें चुनिए,गुनिये,सहेजिये,सम्हालिए
***श्रवण***

कहने को तो वो सख्श बड़ा शीरीं-जुबान है...

कहने को तो वो सख्श बड़ा शीरीं-जुबान है
पर उसके दिल में एक कोयले की खान है
क़ाबिल-ए-गौर हैं उसकी यहाँ बेशर्मियाँ भी
कितना भी ज़लील करो,बड़ी सख्त जान है
***श्रवण***

करें किस पर यहाँ विश्वास,यारो?

करें किस पर यहाँ विश्वास,यारो
यहाँ का हर सख्श नारद हुआ है
हमने सीखा जो उड़ना तब तक
आकाश ही देखो नदारद हुआ है
***श्रवण***

Sunday, January 29, 2012

ज़िंदगी है कि है ये कोई तिलिस्म

लोग भी क्यों प्यार-व्यार करते हैं
नक़ली रिश्तों से कारोबार करते हैं

वो अपने शीशे सम्हालकर रखना
लोग यहाँ पत्थर से वार करते हैं

वो जो करते हैं रोज सत्य की बातें
अंधेरों में झूठ का प्रचार करते हैं

इतने घपले किये हैं मान्यवर ने
कि अब समाज का सुधार करते हैं

कर दिया है जबसे नेत्रदान,यारो
वे किडनियों का व्योपार करते हैं

जिनके कतरे गए हैं पंख वे भी
उड़ानों पे खूब ऐतबार करते हैं

ज़िंदगी है कि है ये कोई तिलिस्म
हम भी बाज़ीगरी से प्यार करते हैं
***श्रवण***

Saturday, January 28, 2012

मेरे इस दर्द को तुम अपने रु-ब-रु रखना

मेरे इस दर्द को तुम अपने रु-ब-रु रखना
इस तरह दिल की मेरी छोटी आरजू रखना

हो गए प्यार के लम्हे भी मुफलिसों जैसे
जिंदगी को हमने सिखाया जुस्तजू रखना

प्यास ही प्यास है अब अपना वजूद मगर
ऐ सहरा, तू समंदर की ज़रा आबरू रखना
***श्रवण***

हमें भी प्यार से गर तुम कभी मिले होते

हमें भी प्यार से गर तुम कभी मिले होते
हमारे बीच न फिर इतने शिकवे-गिले होते

उदास लम्हों को हम ख़ुशगवार कर लेते
वो मुहब्बत के फूल गर कभी खिले होते

जहाँ की रौनकें गर तुझसे मेहरबां होतीं
इस ज़िंदगी के कुछ और सिलसिले होते

तेरे साझे में छोटा घर कभी तामीर हो जाता
तमन्ना कब थी ऐसी कि हमारे भी किले होते

हमने माना कि हम ख़ामोश रहे हैं अक्सर
वो तेरे ख़ूबसूरत लब भी कभी तो हिले होते
***श्रवण***

Friday, January 27, 2012

स्नेह की ख़ातिर समर्पण हो गया हूँ...

(एक)
नित तेरा प्रतिबिंब पाती रही आंखें
सुधियों में सहेज वही मधुर बातें
राह देखा किया हरदम सोच कर
यदि कहीं होते छिपे तुम लौट आते

(दो)
स्नेह की ख़ातिर समर्पण हो गया हूँ
पहले जड़ था अब मैं चेतन हो गया हूँ
पहले जलता था दीये-सा रात-दिन
प्यार की ज्वाला में अब खो गया हूँ
***श्रवण***

Thursday, January 26, 2012

नयनों के द्वार खोले आ गयी सुबह..

(एक)
मधुर गीतों से भरा है प्यार,आओ झूम लें
नेह के इन निर्झरों को मन-प्राणों से चूम लें
अब न बैरागी रहेगा मन हमारा, प्रण करें
अनुरागों की बगिया में चलो फिर घूम लें

(दो)
नयनों के द्वार खोले आ गयी सुबह
सुधियों में प्यार घोले आ गयी सुबह
भूल कर सपनों की बातें,ऐ भोले मन
किरणों संग झूम ले, भूल जा विरह
***श्रवण***

Wednesday, January 25, 2012

तमन्ना है तुम्हे फूलों की..

तमन्ना है तुम्हे फूलों की और मुझे काँटों से राहत
चलो मिल कर के ढूंढें तेरी-मेरी जिंदगी की चाहत
***श्रवण***

इस रात के लिए कोई भी चिराग नहीं...

सभी मित्रों को गणतंत्रदिवस की असीम शुभकामनाओं के साथ:

(एक)
हर घड़ी एक साल होती है
ज़िंदगी यूँ ही मुहाल होती है
तुमने जाने की कसम खाई है
आंखें रो-रो के लाल होती हैं.

(दो)
यह गोल चाँद ही तो है,कोई आग नहीं
इस रात के लिए कोई भी चिराग नहीं
तारे सब गुमसुम हैं,यूँ खोये-खोये से
नैना हैं जलरीते,हर घड़ी-पल रोये से
पलकों की सीपी में नींद ये लहक रही
दर्द भरा चेहरा ले रात भी सुबक रही
सपनों में खोये हैं सुधियों की राख लिये
अपनों में रोये हैं हम अँधेरा पाख लिये.

(तीन)
लो,तुम उदासी ले चले चेहरे पे बांधे
ठहरो,मैं आंखें लगा लूँ सजग प्यासी
देख लूँ जी भर बना एक अजनबी सा
क्या पता फिर लौट आये मधुर हंसी
***श्रवण***

Tuesday, January 24, 2012

अब सियासत हमें बहलाने के लिए है

रोटी का कानून यहाँ भरमाने के लिए है
अपने अरमान ही बस जलाने के लिए हैं
रोशनी के राहबर कभी होते थे यहाँ पर
अब सियासत हमें बहलाने के लिए है.
***श्रवण***

Monday, January 23, 2012

तुझसे ऊबे हुए इस गरीब-मन को

तुझसे ऊबे हुए इस गरीब-मन को
कितना बड़ा तूने ये आसरा दिया
तूने हमसे फिर किनारा कर लिया
जानेमन,फिर से तुम्हारा शुक्रिया
***श्रवण***

ज़िंदगी,लोग कहते हैं,बहुत बड़ी है..

(एक)
एक और सुबह आकर
चिपक गयी है
मेरी खिडकियों के ग्लास पर,
और मेरा मन
अटका हुआ है
पिछली रात की
करवटों में,सपनों में..

(दो)
दर्पण में अपनी परछाई देखकर
वे धीरे से मुस्कराए
और गर्व से बोले-
अर्रे यार! गज़ब..
यह तो अपना ही आदमी निकला..

(तीन)
ज़िंदगी,लोग कहते हैं,बहुत बड़ी है
पर यह न जाने कब से यूँ ही खड़ी है
चमकदार सिक्के-सी धूल में पड़ी है.
***श्रवण***

Saturday, January 21, 2012

दिल में रहती है इक मीठी कसक आठों पहर

दिल में रहती है इक मीठी कसक आठों पहर
उग रहा है आंगन में अब दीवारों का ज़हर
सुधियों में बहुत चुभता है वह वक़्त-ए-सफ़र
अपने ही घर में कहीं होता था वो अपना घर
***श्रवण***

ठिठुरन जब गहरी हो...

ठिठुरन जब गहरी हो,
अलाव तापते लोगों में-
न कोई पंजाबी न ईसाई,
न कोई अछूत न अस्पृश्य,
न कोई हिन्दू न मुसलमान होता है,
ठण्ड से मुक्ति तलाशता हर तन-मन
सिर्फ़ एक धर्मनिरपेक्ष
इंसान होता है.
***श्रवण***

Friday, January 20, 2012

लो,अनमनी-सी धूप की दिखने लगीं तनहाइयाँ!

लो,अनमनी-सी
धूप की
बिकने लगीं परछाइयाँ!

ऊष्मा के गहन रेशे
जी रहे हैं बंदिशों में
शीत के साम्राज्य में अब
सूर्य भी है गर्दिशों में

लो,अनमनी-सी
धूप की
दिखने लगीं तनहाइयाँ!

फिर से वैसे धुंध-कोहरे
और हवा के तीर-भाले
ठण्ड फिर खाने लगी है
धूप के गहरे निवाले

लो,अनमनी-सी
धूप की
होने लगीं रुसवाइयाँ !
***श्रवण***

ज़िंदगी में जब कभी रोशनी से साथ छूटता है

ज़िंदगी में जब कभी रोशनी से साथ छूटता है
अंधेरों का काफ़िला हमें बेरहमी से लूटता है
ख़्वाब अपने खो गए हैं इन्ही वीरानियों में
क्या कोई सपना किसी अपने से ऐसे रूठता है
***श्रवण***

Tuesday, January 17, 2012

कि तू बस इक याद बन कर रह गई

तेरी यादों की वो तासीर यूँ उल्टी पड़ी
कि तू बस इक याद बन कर रह गई
चाहा जो मुक़द्दर का सिकंदर बनना
तू इक फ़रियाद बन कर रह गई
***श्रवण***

Sunday, January 15, 2012

खेत पर खड़ा पुतला ज्यों...

(एक)
रूप-रंग चोखा है
नाम भी अनोखा है,
सावधान!-- कहा किसी ने
खेत पर खड़ा पुतला ज्यों
धोखा है...
धोखा है.

(दो)
दिल के हैं पत्थर पर
चेहरे बड़े भोले हैं,
चांदी के बर्तन में
तीखा ज़हर घोले हैं.

(तीन)
चिंता-चिता
दो जुड़वा बहनें,
तन-मन को सिर्फ़
जलाना जानती हैं,
ज़िंदगी भर
और ज़िंदगी के बाद.
***श्रवन***

Saturday, January 14, 2012

बूंद-बूंद कर भर गया घड़ा...

(एक)
बेटी अब बड़ी हो गई
अपने पैरों पर खड़ी हो गई,
मां ने कहा बाप से-
यह भी परेशानी की
एक कड़ी हो गई.

(दो)
बूंद-बूंद कर भर गया घड़ा
देखते-देखते बेटा हो गया बड़ा,
मां-बाप को अब ज़िंदा जलाएगा-
उनके मरने पर
उन्हें आग भी लगाएगा.

(तीन)
वे देते नहीं भूखे को भी
कभी कोई दान,
पर अमर होने के क्रम में-
कर रहे हैं
मरणोपरांत दृष्टिदान.
***श्रवण***

Friday, January 13, 2012

तू जो हंसती है...

तू जो हंसती है
तो बहार मुस्कराती है,
फ़िज़ाओं में जश्न होते हैं,
हम जो हंसते हैं तो
एक पत्ता भी
क्यों नहीं हिलता!

***श्रवण***

आखिर ये दीवार क्यों नहीं टूटती है,यार!

उस तरफ तेरा प्यार,इस तरफ मैं बेकरार
बीच में फैली ये हरजाई ज़माने की दीवार
अब कैसे चलेगा,बोलो,स्नेह का कारोबार
आखिर ये दीवार क्यों नहीं टूटती है,यार!
***श्रवण***

हर चेहरा ख़ूबसूरत हर नाम सुन्दर है

(एक)
हर चेहरा ख़ूबसूरत
हर नाम सुन्दर है,
यह दुनिया भी क्या
सिर्फ़ मुखौटों का घर है?

(दो)
वह कैसे बंटा पाती
तुम्हारी उदासी,
वह तो ख़ुद थी
जन्म-जन्मांतरों की प्यासी.

(तीन)
माना कि सच्चाई में
बहुत दम है,
किन्तु आजकल वह
अपने-आप में ही
कितनी कम है!
***श्रवण***

Thursday, January 12, 2012

शाम का इतिहास और वो अमिट यादें...

(एक)
तुम्हारी आँखों से थोड़ा शराबी तो हो लूँ
तुम्हारे ओठों से थोड़ा गुलाबी तो हो लूँ
ज़रा देर और तुम ठहर जाओ मेरे पास
कुछ तुम बोलो और कुछ मैं भी बोलूं.

(दो)
हमें देखे बिना वे बहुत बेक़रार हो गए
हाथ जो थामा तो प्यार ही प्यार हो गए
पहले होते थे वे मधुर बहार पर नाराज़
अब तो वे ख़ुद बहार ही बहार हो गए

(तीन)
शाम का इतिहास और वो अमिट यादें
प्यार का मधुमास और वे गीत-बातें
साथ सम्मुख बैठकर भी मौन हम-तुम
क्यों नहीं वे पल अछूते हम भूल पाते
***श्रवण***

Wednesday, January 11, 2012

शाम बनकर तेरी याद...

(एक) बंधन

सूरज ने लालिमा से
फिर भरी सुबह की मांग,
पहनाये किरणों के कंगन,
जन्म-जन्म के बंधन...

(दो) ज़िंदगी

थके पांव,
दौड़ती हुई एक सड़क
जो लौटना नहीं जानती,
अपने गाँव...

(तीन) अपनापन

शाम बनकर तेरी याद
फिर लौट आयी है
मेरे पास,किन्तु
बेहद उदास...
***श्रवण***

Tuesday, January 10, 2012

तू है बेशक कलश तो हम भी यहाँ बुनियाद हैं...

तू है बेशक कलश तो हम भी यहाँ बुनियाद हैं
हमसे ही सदियों इमारत यहाँ पर आबाद है

रोटियों का दर्द लेकर जी रही उस कौम को
कब तलक कहते रहोगे,व्यर्थ की फ़रियाद है

और कितना तुम भरोगे गर्भगृह को इस तरह
जय तुम्हारी हो न हो पर देश तो बर्बाद है

तुमने जो चाहा यहाँ वो अपने नाम कर लिया
और झांसे हमको मिलते,यह वतन आज़ाद है

सर उठाने लग गई हैं अब मशालें हर तरफ
अब न सम्हले तो यहाँ पर सबकी मुर्दाबाद है
***श्रवण***

शहर के आईने भी हो गए हैं खुदगर्ज़ इतने...

शहर के आईने भी हो गए हैं खुदगर्ज़ इतने
कि हमारे अक्स की क़ीमत हमसे मांगते हैं
पत्थरों से सर फोड़ना कब छोड़ा था हमने
फिर भी ये पत्थर हमें शीशा ही मानते हैं
***श्रवण***

Monday, January 9, 2012

अब हमारे यूँ बहके हुए ये अंदाज़ रोकते हो...

दबे-कुचले लोगों की मुखर आवाज़ रोकते हो
उड़ने को बेताब परिंदों की परवाज़ रोकते हो
तुम पर कब होता था गिड़गिड़ाने का असर
अब हमारे यूँ बहके हुए ये अंदाज़ रोकते हो
***श्रवण***

ये दिल है मेरा कि कोई सूना मज़ार है...

ये दिल है मेरा कि कोई सूना मज़ार है
न तो रोशनी कोई,न जश्न यहाँ होते हैं
मुझको अपना कहने वाले आकर देख
तन्हाई में अक्सर सारे दर्द जवां होते हैं
***श्रवन***

Sunday, January 8, 2012

ऐसे में मेरा मन गुनगुना होने लगा है...

मौसम का रुख़ अनमना होने लगा है
कोहरा फिर से यहाँ घना होने लगा है
अब तो बदल अपना मिजाज़,ऐ दोस्त
ऐसे में मेरा मन गुनगुना होने लगा है
***श्रवण***

तबस्सुम बिखेरते हुए...

वो हमारी जानिब
तबस्सुम बिखेरते हुए
गुज़र गए,
और हम--
उनकी हंसी के टुकड़ों को
ज़मीन से
बीनते रह गए...
***श्रवण***

Saturday, January 7, 2012

जो अपनी प्यास लेकर के समंदर तक गए होते...

जो तुझसे प्यार की ताज़ीर मुक़र्रर हो गई होती
तो हमने ज़ुर्म का इक़बाल कब का कर लिया होता
जो अपनी प्यास लेकर के समंदर तक गए होते
तो दिल को एक नखलिस्तान जैसा भर लिया होता
***श्रवण*** (ताज़ीर ...सज़ा)

हर अँधेरे के लिए बस,दिल के चिराग थे...

ज़िंदगी के वास्ते सब मुश्किलें मंजूर थीं
हर सियाही के लिए ये रोशनी मजबूर थी
गम में हंसते ही रहे,वो दिल के दाग थे
हर अँधेरे के लिए बस,दिल के चिराग थे...
***श्रवण***

Friday, January 6, 2012

तुमने जाने कि कसम खाई है जबसे...

अब तसल्ली के लिए कोई पैगाम नहीं
मुश्किलें इतनी बढ़ीं हैं कि आराम नहीं
तुमने जाने कि कसम खाई है जबसे
इससे बड़ा कोई मातम-कोहराम नहीं
***श्रवण***

Thursday, January 5, 2012

अपनी आँखों में तेरा आकार मुझको चाहिए

अपनी आँखों में तेरा आकार मुझको चाहिए
प्यार अपना दो न दो,अधिकार मुझको चाहिए
गर तुम्हे मैं याद आऊं,भूलने का हक़ तुम्हारा
अपने सपनों में तेरा आधार मुझको चाहिए
***श्रवण***

Wednesday, January 4, 2012

पत्थरों के शहर में अब कुछ न कहो...

पत्थरों के शहर में अब कुछ न कहो
तसल्ली का ज़हर पियो,ख़ामोश रहो
रूठा है हर दरख़्त यहाँ अपने साये से
नारों और वादों में डूबो, मदहोश रहो
***श्रवण***

किरणों से नहाती चिड़िया...

इस खिली धूप में किरणों से नहाती चिड़िया
ऐसा अहसास है कि जैसे हम भी ज़िन्दा हैं
***श्रवण***

Tuesday, January 3, 2012

रसिक भौरों से जरा संकोच भी...

रूप-यौवन नग्न है
उन्मत्त है यह अप्सरा,
क्यों उतर आयी स्वर्ग से धरा पर?,
गीत भी है,नृत्य भी और लोच
रसिक भौरों से जरा संकोच भी,
मीन लोचन रसभरे दो संग हैं,
आज निश्चय ही समझ लो-
किसी ब्रह्मचारी की तपस्या
भंग है...
***श्रवण***

बहुत दुखते हैं अपने कन्धों पर टूटे पर...

सड़कों पर पथराव व शोरगुल देखकर
याद बहुत आया हमें वो अपना शहर
उड़ने की चाह लिए नीला विस्तार देख
बहुत दुखते हैं अपने कन्धों पर टूटे पर
***श्रवण***

Monday, January 2, 2012

सबके सीने में अभी तपिश बहुत बाकी है

सबके सीने में अभी तपिश बहुत बाकी है
उनके मशालों के लिए आग बांटनी होगी
जहाँ दीवारें नहीं,उनके लिए छत के पयाम
ये खाइयाँ भी वगावत से पाटनी होंगी
***श्रवण***...

Sunday, January 1, 2012

आखिर हमारे होने का किसी को अहसास तो हो...

(एक)
ज़िंदगी में हम कभी यूँ इतने परेशान तो न थे
ग़मों का सहारा था,खुशियों के सामान तो न थे

(दो)
आखिर हमारे होने का किसी को अहसास तो हो
बेशक नज़रों से रहे दूर पर दिल के पास तो हो

(तीन)
बेहद रो रही थी एक औरत रात को गुमसुम
जो पूछा कौन है,तो वो अपनी ज़िंदगी निकली

(चार)
फिरतें हैं हाथों में लिए अपने दिल के टुकड़ों को
लूटा है फिर उसी ने मुहब्बत का नाम ले कर

***श्रवण***