Monday, May 30, 2011
रेत का संसार हमारे सामने है..
सूखता घरबार हमारे सामने है
मृत होती हैं मधुर हवाएं देखो
सूना विस्तार हमारे सामने है
अब भी गर हम सम्हले नहीं
मृत्यु का कारोबार हमारे सामने है
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
अपनी ही छाया से साथ यहाँ छूटा है...
पूछो न हमको किस-किस ने लूटा है
इस क़दर भागे हम परछाई के पीछे
अपनी ही छाया से साथ यहाँ छूटा है
जिन्दा रहना बोझ हमारे सर पर भारी
घनी धूप में हर दरख़्त हमसे रूठा है
महलों से संवाद बनाने वालो सुन लो
हम झोपड़ों के सर क्या-क्या फूटा है
अब तो सियासत के दावे-वादे पहचानो
सभी नमूनों का इक-इक लफ्ज़ झूठा है
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
क़ैद रह गए पीले फूल किताबों में ...
वैसे जबान जाने क्या-क्या कह गयी
क़ैद रह गए पीले फूल किताबों में
अपनी काया विरह-वेदना सह गयी
सुधियों की दीवार हमारी थाती थी
रिश्तों की आंधी में देखो ढह गयी
(श्र.कु.उर्मलिया तिवारी)
मेरे शहर का अख़बार...
मेरे शहर का अख़बार
बहुत लापरवाह हो गया है इन दिनों;
अब यह अजनबी और अविश्वसनीय
समाचारों से आतंकित करता है
मेरे शहर के लोगों को-
न कहीं हत्या के हैरतअंगेज कारनामे,
न कहीं बलात्कारों के सामाजिक समारोह,
अपहरण और डकैती के सांस्कृतिक
कार्यक्रम भी कहीं नहीं,
न कहीं कालाबाजारी न कहीं रिश्वतखोरी,
हिंसा,आतंक और पथराव का
कहीं नामोनिशान ही नहीं-
न जाने क्या हो गया है अख़बार को,
कि छापता है यह अनबूझ पहेली सी ख़बरें:-
हर महकमें में फ़ैल गया है ईमानदारी का ज़हर,
भ्रष्टाचार हफ़्तों से नदारद है शहर से,
अपराधी को सजा मिलती है
और बेगुनाह को न्याय,
न कोई कहीं भूखा है न नंगा,
गरीबी लापता है और
शहर कि लड़कियां तरसती हैं
कि कोई उन्हें छेड़े-
ख़बरों के ज़रिये खुद को बेचनेवाला
मेरे शहर का अख़बार अब
कोई भी नहीं खरीदता,क्योंकि
मेरे शहर के लोग
हत्या,बलात्कार और अपराधों के
स्वाद के आदी हो चुके हैं-
अब यह अख़बार मेरे शहर का
अविश्वसनीय अख़बार हो गया है...
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
Sunday, May 22, 2011
झूठे होते ढाई-आखर...
धूप के विषधर,
फिर भी खिलते हैं
हमारे मन में गुलमोहर...
खो गए हैं हम बियाबानों में-
मन के थर्मामीटर में देखो
चढ़ता है अब पीड़ा का पारा,
कहीं हमको चीरता है
सुधियों का आरा
मरुस्थल की ज़िंदगी है
प्यास का लम्बा सफ़र,
सूख रहे गाँव-गाँव
स्नेह के नदी-पोखर...
समय का सन्यासी बंजारों सा,
अनकहे संवाद लेकर जी रही
आस्था वीरानों में,
आदमी के हक़ दिखते नहीं
आज के संविधानों में
कपट भरे वातायन में
भीतर कुछ है बाहर कुछ,
छलती हैं दुविधाएं पल-छिन
झूठे होते ढाई-आखर...
रोशनी के गीत रेहन हो गए,
सभ्यता के दंश हैं और
भ्रमित भावी पीढ़ियां,
अधोगामी हो रही हैं
नैतिकताओं की सीढ़ियां...
स्नेह के सन्दर्भ पनपे
जग की कटुता पाकर,
सारी बाजी जीती हमने
अपनों को तिल-तिल खोकर...
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
Tuesday, May 17, 2011
जिंदगी अब दर्द की जागीर है..,
टूटी-बिखरी हाथ की लकीर है
ज़माना है और उसकी जिल्लतें
इन दिनों ये वक़्त भी बेपीर है
हर तरफ हैं भटकनों की रंजिशें
किस्मतों का फैसला आखीर है
पास अपने उलझनें ही उलझनें
हम भी यारो,बहुत ही अमीर हैं
है वही दुनिया की झूठी रौनकें
इन फरेबों की यही तासीर है
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
Monday, May 16, 2011
दिल-ए-नादाँ को ज़रा आराम देना है...
हमारी चाहतों को इक अंजाम देना है
गिले-शिकवे भी थोड़ा लाज़िमी हैं
ज़माने भर को ये पैगाम देना है
...
जब तू ही तू है मेरी निगाहों में
दिल चुराया, किसे इल्ज़ाम देना है
मिल गयी मंजिल...
कोई बताये इस नादाँ को इसे मिल गयी मंजिल
ज़िंदगी पर कहर बरपा करते लोग...
नफ़रतों का ज़हर देखो भरते लोग
हर तरफ फैला सियासत का धुआं
शासन के चीरों को कैसे हरते लोग
दर्द लिए हर चेहरा बेहद खौफज़दा
इसीलिए ख़ुशियों से शायद डरते लोग
भूख लगे तो अपनी प्यास बुझा लेते
बाहर ज़िंदा पर भीतर से मरते लोग
हमें सलीबों का मतलब समझाने को
लाशों के ऊपर लाशों को धरते लोग
(श्र.कु.उर्मलिया तिवारी)
(३०/०३/२०११ को गंगटोक से लौटते हुए)
सियासत भी है अब महज एक कारोबार...
कि हर चेहरा है यहाँ पर दर्द का इश्तेहार
हर तरफ फैली चुनावी तिकड़में-नारेबाजियां
सियासत भी है अब महज एक कारोबार
इस कदर हालात बदतर औ बेकाबू हुए
क्या किसी को भी है यहाँ कोई सरोकार
गाँधी-नेहरु-तिलक ने सींचा इस धरती को
भ्रष्टाचार यहाँ का अब सबसे अहम् त्यौहार
कुछ न कुछ तो अब करना है मेरे दोस्तों
पर लाएं कहाँ से एक नहीं अन्ना हजार
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
०८/०४/२०११
विरह के स्पर्श देखो छा रहे पुरवाइयों में...
जो ढूढ़ते हैं जिन्दगी को परछाइयों में
यूँ दर्द का सिजदा किये, तनहा रहे
खो गए हम खुद-ब-खुद गहराइयों में
...
जो कल तलक होते थे अपने राजदार
आज वो शामिल हैं क्यों तमाशाइयों में
अब बेरुख़ी बढ़ने लगी उनकी तरफ़ से
विरह के स्पर्श देखो छा रहे पुरवाइयों में
सांप और सपेरों के देश में,ऐ ज़िंदगी
खो न जाना तू यार की अंगड़ाइयों में
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
वो हंसी ज़ख्म मुझे फिर कहाँ पाएंगे...
वो हंसी ज़ख्म मुझे फिर कहाँ पाएंगे
मुझ से बिछड़े हैं बहुत ख़ुश होकर
मैं परेशां,वो मुझे कैसे अब तड़पाएंगे
(श्र.कु.उर्मलिया तिवारी)
झोपड़ों की जुबान...
कितना अच्छा होता यदि झोपड़ों की
भी जुबान होती..(श्र.कु.उर्मलिया तिवारी
दृष्टिदान..
कभी कोई दान,
पर अमर होने के क्रम में
कर रहे हैं मरणोपरांत
दृष्टिदान..
ज़िंदगी से प्यार भी त्यों-त्यों बढ़ा...
दर्द का आकार भी त्यों-त्यों बढ़ा
वक़्त के आघात ज्यों गहरे हुए
ज़िंदगी से प्यार भी त्यों-त्यों बढ़ा
(श्र.कु.उर्मलिया तिवारी)
कैसे काटेंगे भला दर्द की जागीर-सा दिन...
भटक रहा है जैसे, किसी फ़कीर-सा दिन
ये न हिन्दू न सिर्फ़ मुसलमानों का
हर कोई चाहता है यहाँ कबीर-सा दिन
निकल तो आये हैं हम घर से लेकिन
घर के बाहर भी है इक जंजीर-सा दिन
हर तरफ हो गयी है भीड़ इश्तिहारों की
हमने भी छांट लिया है इक तस्वीर-सा दिन
हो गए हैं क़ैद हम विरह की हवेली में
कैसे काटेंगे भला दर्द की जागीर-सा दिन
अब न कोई लक्ष्य ही बाकी यहाँ पर
फिर भी अर्जुन चाहता है तीर-सा दिन
लाख पत्थर सहे हैं उसने इस ज़माने के
कैसी वहशत कि उसे चाहिए हीर-सा दिन
हम जिए प्यास लिए दूर बियाबानों में
दिल को चुभता रहा कहीं कश्मीर-सा दिन
कब भला शाम ढले और हम तुमसे मिलें
खिंच रहा देखो भला,द्रौपदी के चीर-सा दिन
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
Monday, May 9, 2011
मैं सुबह-ओ-शाम घिरा रहता हूँ खुशबू से तेरी...
गर बाकी है कहीं कुछ कसर, वो कसर क्या है
मैं सुबह-ओ-शाम घिरा रहता हूँ खुशबू से तेरी
कुछ तो है बात अपने बीच,वो मगर क्या है
कर तो दूँ ज़िंदगी को अपने तेरे नाम,जब चाहूँ
पहले मालूम तो हो, होगा असर,वो असर क्या है
हर सफ़र वीरान थे और मंजिलें ख़ामोश थीं
अब तेरे बगैर कटे कोई सफ़र,वो सफ़र क्या है
मैं हूँ गर रेत सा प्यासा तो है तू इक दरियादिल
जो बुझा पाये मेरी प्यास बता ,वो लहर क्या है
Saturday, May 7, 2011
मुझे तुम्हारे बंधन प्रिय हैं...
क्योंकि तुम मुझे
जितना ही बांधना चाहती हो
उतना ही मैं स्वतंत्र होता जाता हूँ.
तुम्हारे आंसुओं का मैं
उपासक हूँ,क्योंकि उनसे
पहचान पाता हूँ अपनी अपवित्रता,
और सीख पाता हूँ हँसना;
खुश रहना.
तुम्हारी मुक्त खिलखिलाहटों से
प्रेरणा लेकर ही मैं
कई-कई बार रो सका हूँ;
सच्चे आंसू.
तुम्हारी रहस्यमयी ख़ामोशी ने
सुझाये हैं जीवन के रहस्य
और मेरे प्रति तुम्हारी
अगाध श्रद्धा ने ही
बना दिया है मुझे तुम्हारे प्रति
लापरवाह एवं श्रद्धाहीन.
तुमने तो शायद
मधुर मिलन का विश्वास
संजोया था मन में..
बिछड़ गया हूँ इसीलिए
मैं तुमसे आखिर.
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
दान...
कभी कोई दान,
पर अमर होने के क्रम में
कर रहे हैं मरणोपरांत
दृष्टिदान..
बेहद ख़ुश रहे हम दर्द का ख़ुमार पाकर...
जीते हैं कैसे लोग यहाँ प्यार पाकर
अपना चमन हंसी था,तेरे बगैर हमदम
अब हो गया बयाबां,तुझसे बहार पाकर
रोशन किया है हमने,ख़ुद अपने चरागों को
तुझसे ही अंधेरों की लम्बी क़तार पाकर
चट्टान का पिघलना,वो अश्क बनके बहना
हम आजमा रहे हैं इक ग़मगुसार पाकर
पीरों की दुआओं का मैं एक तनहा आदम
क्यों उनको भी ख़ुशी है मेरा मज़ार पाकर
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
मां
शांति/नम्रता/डांट/फटकार
अविश्वास की कंटीली झाड़ियाँ
ढेर सारे आंसू/आहें
लाल बिंदी/भरी हुई मांग
जिस्मानी रिश्तों के अजगर
ढेर सारे बच्चे/ममता/स्नेह
और एक निकम्मा पति--
उस मां के पास इनके सिवा
और कुछ नहीं था...
सूनी-सूनी आँखों में
भूख की हकीक़त/प्यास के सपने
खिचड़ी बाल/धूल सने पैर
रोना-धोना और
फटे कपड़ों की इज्ज़त--
उस घर में
बच्चों की दौलत थी...
खटिया पर तिलमिलाते
खांसी के दौर
आज के उत्तर/कल के सवाल
धार्मिक किताबें/पुराना चश्मा
सरौता/चुनौटी/तुलसी की माला
जिम्मेदारियों का फैला तालाब
तैर जाने की तमन्ना
डूब जाने का भय--
उस घर का बाप
किनारे खड़ा था...
वह परिवार क़ैद था आंगन में
और मां की डोर से
बांधे हुए था
आंगन को...
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
जब भी तेरी गली से...
ए दोस्त,क्यूँ ये तुझपे,बहुत नागवार गुजरा
दिल में थी तमन्ना,कोई हाल-ए-दिल तो सुनता
पर ऐसी बदनसीबी,न कोई ग़मगुसार गुजरा
तू नहीं होती है जब पास मेरे...
बेखुदी अपनी कुछ बेमानी लगती है
जिंदगी और भी पुरानी लगती है
ख़्वाब-दर-ख़्वाब आदमी के लिए
लम्हे-लम्हे की कहानी लगती है
फिर उजालों की फसल होगी यहाँ
हमको यह सोचकर हैरानी लगती है
उनको देखा तो दिल उदास हुआ
उनकी सूरत बहुत पहचानी लगती है
भुनकर खा रहे हैं मांस सभी
भूख इनकी कुछ जिस्मानी लगती है
दर्द कश्ती है और दुनिया की नदी
ऐसे में रात हर तूफानी लगती है
तू नहीं होती है जब पास मेरे
कोई किस्मत की बेईमानी लगती है
(०३ दिसंबर,१९७८)
चीख़ने से कुछ नहीं होता यहाँ..
रोशनी की राह जो रोके खड़े हैं
जिंदगी भर हम उन्ही से लड़े हैं
चाह थी,सब को मौका मिल सके
पर सियासत ने यहाँ ताले जड़े हैं
जिंदगी के ख़्वाब सच्चे हो सकें
हम हैं छोटे इसलिए सपने बड़े हैं
जो बहुत रहते थे अक्सर सुर्ख़ियों में
आज वे सब शर्म से नीचे गड़े हैं
बंधनों के ज़हर में खोये हुए हैं
जितने भी रिश्ते मिले सब सड़े हैं
चढ़ गए हैं मंच पर चमचे यहाँ
और हम सब हाशिए में पड़े हैं
चीख़ने से कुछ नहीं होता यहाँ
फोड़ दो इनको ये चिकने घड़े हैं
(०५/०३/२०११)
कितनी खामोश और रंगीन है शाम..
कितनी ख़ामोश और रंगीन है शाम
रुई के फाहों सी महीन है शाम
कल के वायदे का ऐतबार नहीं
आज के वास्ते यकीन है शाम
ऐसे मौसम में क्यों अकेले हुए
आपकी ख़ातिर तौहीन है शाम
हमने अक्सर इसे चखकर देखा
खट्टी- मीठी नहीं,नमकीन है शाम
इतना ख़ुश होके कोई क्या समझे
हाय! किस दर्द से ग़मगीन है शाम
काश! मेरे पास इक आईना होता
तुमसे कहता,तुमसे हसीन है शाम
फ़लक से उतरेगा अंधेरों का हुज़ूम
रात के वास्ते इक ज़मीन है शाम
यहाँ बेख़ौफ़ हो कर अब मैं काटों से गुज़रता हूँ
यहाँ बेख़ौफ़ हो कर अब मैं काटों से गुज़रता हूँ
तेरी दुनिया में लेकिन बहुत मैं फूलों से डरता हूँ
सुना करता था लोगों से, यहाँ इंसान रहते हैं
मिलते हर जगह जंगल,मैं भीतर से सिहरता हूँ
बड़े क़द के थे जितने लोग,सब हो गए बौने
इधर मैं राजपथ को छोड़,जनपथ पर उतरता हूँ
यहाँ उम्मीद इक सागर से रेगिस्तान बनती है
नहीं मिलती मुझे मंज़िल,मैं ख़्वाबों सा बिखरता हूँ
तेरी ख़ातिर,मेरी ऐ जिंदगी,सोचा बहुत कुछ था
मगर हालात ऐसे है , बहुत अफ़सोस करता हूँ
है चिरप्रतीक्षित वही चांदनी रात...
है चिरप्रतीक्षित वही
चांदनी रात,
झिलमिल तारों से
पूरा व्योम लिखा-
जैसे तेरी-मेरी बात...
है इतनी धवल उजास,
स्वप्नलोक सी दुनिया में
दूर दूर तक सूना सब कुछ
फिर भी कोई पास-
है ये मधुर बयार या
ख़ुशबू की बारात...
नींद नहीं तिरती आँखों में,
मिलन-यामिनी लेकर आई
सघन उड़ानें प्यार-स्नेह की
चाहत की पाखों में-
करते है मनुहार समय से
हो न जल्दी प्रात...
अधरों के आश्वासन अनगिन,
मौन-निमंत्रण नयनों में
कितना अच्छा हो गर
रुक जाएँ पल-छिन-
विजय सुनिश्चित अनुरागों की
अब न होगी मात..
झिलमिल तारों से
पूरा व्योम लिखा
ज्यों तेरी-मेरी बात...
(सुपर मून को समर्पित.. १९/०३/२०११)
Friday, May 6, 2011
आदमी ने छोड़ दी आदमी कि रहगुजर...
कोई तरक़ीब भी होती नहीं है कारगर
हर तरफ बढ़ते ही जाते सांप-अजगर
दर्द का नासूर ले कर जी रहें हैं लोग
क्यों नहीं दिखते कहीं आक्रोश के नश्तर
जिंदगी के बुतों को तोड़ते हैं बुतशिकन
रहनुमां कानून के हो गए ख़ुद सितमगर
हो चुकी है सभ्यता, पुनः एक पाषाणयुग
आदमी ने छोड़ दी आदमी की रहगुज़र
रंजिशों के दौर में मातमों का शोर, यारो
इस चमन का हाल है अब यही मुख़्तसर
*श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी*
(क्या देश के ऐसे हालातों के लिए ही उन त्रिदेवों ने
अपनी क़ुरबानी दी थी?गर्व किन्तु भारी मन से उन
महान आत्माओं को याद करते हुए..२३ मार्च,२०११)
की हर चेहरा है यहाँ पर दर्द का इश्तेहार...
कितनी मुस्तैद हो गयी है अब हमारी सरकार
कि हर चेहरा है यहाँ पर दर्द का इश्तेहार
हर तरफ फैली चुनावी तिकड़में-नारेबाजियां
सियासत भी है अब महज एक कारोबार
इस कदर हालात बदतर औ बेकाबू हुए
क्या किसी को भी है यहाँ कोई सरोकार
गाँधी-नेहरु-तिलक ने सींचा इस धरती को
भ्रष्टाचार यहाँ का अब सबसे अहम् त्यौहार
कुछ न कुछ तो अब करना है मेरे दोस्तों
पर लाएं कहाँ से एक नहीं अन्ना हजार
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
०८/०४/२०११
प्यास के चीत्कार...
पहाड़ जैसे दिनों से
निकलती थी जो
रातों जैसी गहरी नदी-
खो गयी है
यहीं कहीं
इस रेतीले विस्तार में...
समय के पंखों से
बनती थीं जो
सपनों जैसी
उड़ानों की आकृतियाँ-
दम तोड़ गयी हैं
इसी छद्मवेशी आकाश की
अतल गहराइयों में...
टिटिहरी की
दर्द भरी आवाज़ से
बिखरते थे जो
प्यास के चीत्कार-
लहरों तक आते-आते
गुम हो गए हैं
अतृप्ति की
कंदराओं में...
प्यार और स्नेह से
भरपूर लहराता हुआ
आकाँक्षाओं का महासागर-
भूल गया है
अपनी मर्यादाओं का सत्य
आशंकाओं से भरे
रोजी-रोटी के समीकरण
वाले शहर में...
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
ज़िन्दगी,तू निराला के छंद सी...
फूल और काँटों के सम्बन्ध-सी
ज़िन्दगी,तू निराला के छंद-सी
बंधनों के ज़हर में खोई हुई
ह्रदय से दर्द का अनुबंध-सी
विवशता के द्वीप में याचक बनी
गहन तम में रोशनी के गंध-सी
प्रारब्ध की रक्तरंजित लेखनी से
आत्मा पर व्यथा के निबंध-सी
बंदिशों की क़ैद में पीड़ा लिए
समय पर सुधियों की धुंध-सी
भटकनों की आग में तपती रही
मरुस्थल में प्यास के तटबंध-सी
भवना की शांत सुप्त घाटियों में
डूबकर ही मुक्ति के प्रबंध-सी
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
दर्द हुआ पाहुन सा...
सुबह की हवेली में
किरणों का सन्नाटा-
सुख-दुःख के पल-छिन,
यह न पूछो हमने
किस-किस से बांटा...
छिन गयी हाथों से
समय की जागीर,
सपनों के हाथ जड़ी
व्यथा की ज़ंजीर
उनको सुख फूलों के,
और हमें
दर्द भरा कांटा...
आँखों के तीर पर
आंसुओं के ताल,
सुधियों की बैठकें
मन का चौपाल
दर्द हुआ पाहुन सा,
मौसम की बेटियां
दिखलातीं चांटा...
अपनों की भीड़ में
झूटे सब दांव,
अनचाही राहों पर
बोझिल हैं पांव
दुविधा में डूबा मन,
दिन का मुनीम सिर्फ़
दिखलाता घाटा...
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
तेरी ऑंखें हैं खूब नाम,सकी!
तेरी ऑंखें हैं ख़ूब नम,साक़ी!
ला पिला दे अपने ग़म,साक़ी!
आज की रात इल्तिजा है मेरी,
टूट जाने दे सब भरम, साक़ी!
हमने देखे है यूँ वीराने कई,
तेरे चेहरे से मगर कम,साक़ी!
तेरी महफ़िल में चिराग़ों के लिए,
हमने भी खायी है क़सम, साक़ी!
अपने क़ाबू में दिल नहीं रहता,
तेरी चाहत में इतना दम,साक़ी!
इश्क़ दरिया है, प्यार की लहरें,
बह गए तेरे साथ हम, साक़ी!
ज़िंदगी इस क़दर है उलझी हुई,
तेरे बालों में जितने ख़म,साक़ी!
लोकतंत्र
जब शरीर को नंगा कर
रोशनी स्वयं नंगी हो जाती है;
तब-गाँधी टोपी में क़ैद
तस्वीर को भगवान मानकर,
फूलमालाओं के बंधन
रचते हैं बंदिशों के संविधान-
छल-कपट के कापालिक
अपनी आँखों में ले भीख के कटोरे
याचक बनकर आते हैं
झोपड़ों के द्वार पर;
और सौंप देती है ज़िंदगी
अपने दुखों का कवच,
जो हर महाभारत में उसे
सुखों से बचाता रहा है-
संविधान के पहाड़ ठहाके लगाते हैं;
हर आदमी सरकारी क़ीमत पर
अपनी मौत ढोता है,और
विषधरों के बीच घिरे चंदनवन
का हर दरख़्त
लालफीताशाही की शर्तों पर
रोता है-
कब तक कटते रहेंगे
एकलव्यों के अंगूठे और
कब तक खड़ी रहेंगी
अर्जुन से वीर
पर कर्ण-सी संताने-
सूतपुत्रों की क़तार में?
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
जाने कहाँ गया वह जंगल...
जाने कहाँ गया वह जंगल,
सागौन और महुए के पेड़ों से
भरा हुआ?
नैतिकताओं की नदियाँ,संस्कारों के नाले
परम्पराओं का निर्वाह करती हवाएं
खुशिओं की मुनादी करते पक्षी-गण
और संयमित जानवर,सुसंस्कृत जीव-जंतु-
न जाने कहाँ गया हमारा
वह प्यारा जंगल?
वे पक्षी,जानवर और जीव-जंतु
प्रकृति के नियमों में बंधे
इंसानों से बहुत ऊपर थे
क्योंकि वे स्वयं पर
नहीं करते थे झूठा गर्व..
न जाने क्या हुआ की जब से
शहरी दास्तान सुन लिया जंगल ने,
अपने आप पर और अपनी
सत्ता से हैरान रह गया है...
बहुत अकेला और वीरान
हो गया है अब जंगल-
चील और गिद्ध शहर जा बसे हैं,
चीतों और भेड़ियों ने
पहन लिया है लोकतंत्र को...
नहीं,जंगल अब नहीं है वहां,
जाकर अब वह भी
बस गया है शहर में..
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
मुझे तुम्हारे बंधन प्रिय हैं...
मुझे तुम्हारे बंधन प्रिय हैं
क्योंकि तुम मुझे
जितना ही बांधना चाहती हो
उतना ही मैं स्वतंत्र होता जाता हूँ.
तुम्हारे आंसुओं का मैं
उपासक हूँ,क्योंकि उनसे
पहचान पाता हूँ अपनी अपवित्रता,
और सीख पाता हूँ हँसना;
खुश रहना.
तुम्हारी मुक्त खिलखिलाहटों से
प्रेरणा लेकर ही मैं
कई-कई बार रो सका हूँ;
सच्चे आंसू.
तुम्हारी रहस्यमयी ख़ामोशी ने
सुझाये हैं जीवन के रहस्य
और मेरे प्रति तुम्हारी
अगाध श्रद्धा ने ही
बना दिया है मुझे तुम्हारे प्रति
लापरवाह एवं श्रद्धाहीन.
तुमने तो शायद
मधुर मिलन का विश्वास
संजोया था मन में..
बिछड़ गया हूँ इसीलिए
मैं तुमसे आखिर.
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
भ्रष्ट हैं अब आचरण, हो रहे हैं जिधर देखो अस्मिता के चीर-हरण!
भ्रष्ट हैं अब आचरण,
हो रहे हैं जिधर देखो
अस्मिता के चीर-हरण!
भ्रष्ट है अब वातावरण,
कौन सिखलाये हमें
लोभ से संवरण?
आस्था ने खो दिए आयाम
सपने टूटें पल-छिन अविराम
मन को छलता है विश्वास
झूठे लगते धरती-आकाश...
कहाँ है आशा की किरण,
जो निर्मल कर दे
अंधकारों के अंतःकरण?
चेहरे जो दिखते फूलों से
चुभते हैं निर्मम शूलों से
उजले जितने भी व्यक्तित्व
हैं बस कालिख के अस्तित्व...
सत्य बन गया कुम्भकरण,
कौन देगा पाप को
पुण्य भरे जागरण?
भ्रष्टाचार की चलें हवाएं
दूषित होती सभी दिशाएं
विषपायी हैं श्रद्धा के स्वर
खोये प्रेम के ढाई आखर...
नागफनी के अंकुरण,
देश के अभयारण्य में
भेड़ियों का विचरण!
जहरीले वातायन का विस्तार
देता अक्रोशों को आकार
नपुंसक होने लगे विरोध
पराजित होने लगे अनुरोध...
मिथ्या राह का अनुसरण,
दंश सहते जी रहे
ज़िंदगी के व्याकरण!
रोशनी जो क्षितिज के पार
मिटाएगी तमस का संसार
हम मिलजुल करें प्रयास
स्थापित हो फिर विश्वास...
भ्रष्ट न पाए कहीं शरण,
तभी होगा अतिशीघ्र
समस्या का निराकरण!
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
तेरी तनहाइयों का गर ज़िम्मेदार हूँ मैं...
तेरी तनहाइयों का गर ज़िम्मेदार हूँ मैं
अब भी आजा कि तेरा इंतज़ार हूँ मैं
दर्द अंगारा बनके हमको रोशनी देगा
तेरे ज़ख्मों से मगर खूब शर्मसार हूँ मैं
तेरे रोने से जो सावन कि घटायें बरसें
दिल से उन अश्कों का गुनहगार हूँ मैं
मन के आंगन में तेरा प्यार गवाही देगा
कैसे बतलाऊं कि अब तेरा क़र्ज़दार हूँ मैं
अपने सपनों में मुझे थोड़ी जगह दे देना
हिस्सा बनना है मुझे तेरा, बेक़रार हूँ मैं
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
हाँ,मैं ज़िंदा हूँ क्योंकि तुम आज भी ज़िंदा हो मेरे भीतर
हाँ,मैं ज़िंदा हूँ
क्योंकि तुम
आज भी ज़िंदा हो
मेरे भीतर
एक लौ की तरह
झिलमिलाती हुई--
हाँ,मैं ज़िंदा हूँ
क्योंकि
मेरे मन की दरकती ज़मीन पर
आज भी बरसाती हो तुम
अपने प्यार-स्नेह की बूंदें
और स्वयं अंकुरित होती हो
जीवन की हरियाली बनकर--
हाँ,मैं ज़िंदा हूँ
क्योंकि
मेरे अंतर्मन में
आज भी गूंजती हो तुम
अपने द्वारा उच्चारित
मधुर शब्द बनकर
और भर देती हो
मेरे भीतर के गहन सन्नाटे को
अपनी गुनगुनाहट से--
हाँ,मैं ज़िंदा हूँ
क्योंकि तुम्हारी पीड़ा-व्यथा
निश-दिन,पल-पल
लिखती रहती है
मेरे अंतस के कागज़ पर
दर्द की इबारतें,
और तुम आंसू बनकर
निरंतर समाहित होती रहती हो
मेरी ह्रदय-सरिता में--
काश!मैं सहला पाता तुम्हारी पीड़ा
अपने अनचाहे स्पर्श से,
या तुम्हे छूकर;
या तुम्हारे हाथों को
अपने हाथों में लेकर;
या संभव होता,तो
तुम्हारे सर को
अपने अभागे कन्धों पर
टिका कर;
दे पाता तुम्हे
थोड़ी सी तसल्ली--
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
इस शहर में अपनों का गुमां डूब रहा है
इस शहर में अपनों का गुमां डूब रहा है
अब किससे कहें अपना मकां डूब रहा है
हर शाम मेरी आँखों से कहता है ये सूरज
मैं यहाँ डूब रहा हूँ ,तू वहां डूब रहा है
यादों ने ले लिया है मेरी,बाढ़ का रंग-रूप
ऐसे में जाने कौन कहाँ डूब रहा है
मंजिलें हैं, रास्ते हैं, पर सफ़र वीरान हैं
रेत पर क़दमों का निशां डूब रहा है
मुजरिमों के बीच फरयाद का क्या करें
मुखबिरों में अपना बयां डूब रहा है
(१७ फरवरी,१९७८)
मगर अफ़सोस हमको पत्थरों के ये शहर मिले
मगर अफ़सोस हमको पत्थरों के ये शहर मिले
जहाँ दीवार की मानिंद ढहते जी रहे हैं लोग
उसी बस्ती में अपने काफ़िलों को हमसफ़र मिले
वो अफ़साने,जिन्हें दहलीज़ पर हम छोड़ आये थे
वही फिर आज तनहाई में क्यों मद्देनज़र मिले
इरादों की हवेली में ख़ुशी नासूर बनती है
तकाज़ों को हमारे जब तसल्ली का ज़हर मिले
कहीं पर वारदातें है, कहीं आतंक या पथराव
उठा लो कोई भी अखबार,ऐसी ही ख़बर मिले
शहर हो लाख दिलकश,वो फरेबों का करिश्मा है
करें गर बुतपरस्ती तो दुआओं में असर मिले
पहेली है अँधेरी रात, इसे हल करना ही होगा
करो अब खूं से चरागाँ कि मुकम्मल सहर मिले