यहाँ बेख़ौफ़ हो कर अब मैं काटों से गुज़रता हूँ
तेरी दुनिया में लेकिन बहुत मैं फूलों से डरता हूँ
सुना करता था लोगों से, यहाँ इंसान रहते हैं
मिलते हर जगह जंगल,मैं भीतर से सिहरता हूँ
बड़े क़द के थे जितने लोग,सब हो गए बौने
इधर मैं राजपथ को छोड़,जनपथ पर उतरता हूँ
यहाँ उम्मीद इक सागर से रेगिस्तान बनती है
नहीं मिलती मुझे मंज़िल,मैं ख़्वाबों सा बिखरता हूँ
तेरी ख़ातिर,मेरी ऐ जिंदगी,सोचा बहुत कुछ था
मगर हालात ऐसे है , बहुत अफ़सोस करता हूँ
No comments:
Post a Comment