Saturday, May 7, 2011

बेहद ख़ुश रहे हम दर्द का ख़ुमार पाकर...

बेहद ख़ुश रहे हम दर्द का ख़ुमार पाकर
जीते हैं कैसे लोग यहाँ प्यार पाकर


अपना चमन हंसी था,तेरे बगैर हमदम
अब हो गया बयाबां,तुझसे बहार पाकर


रोशन किया है हमने,ख़ुद अपने चरागों को
तुझसे ही अंधेरों की लम्बी क़तार पाकर


चट्टान का पिघलना,वो अश्क बनके बहना
हम आजमा रहे हैं इक ग़मगुसार पाकर


पीरों की दुआओं का मैं एक तनहा आदम
क्यों उनको भी ख़ुशी है मेरा मज़ार पाकर


(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

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