कोई तरक़ीब भी होती नहीं है कारगर
हर तरफ बढ़ते ही जाते सांप-अजगर
दर्द का नासूर ले कर जी रहें हैं लोग
क्यों नहीं दिखते कहीं आक्रोश के नश्तर
जिंदगी के बुतों को तोड़ते हैं बुतशिकन
रहनुमां कानून के हो गए ख़ुद सितमगर
हो चुकी है सभ्यता, पुनः एक पाषाणयुग
आदमी ने छोड़ दी आदमी की रहगुज़र
रंजिशों के दौर में मातमों का शोर, यारो
इस चमन का हाल है अब यही मुख़्तसर
*श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी*
(क्या देश के ऐसे हालातों के लिए ही उन त्रिदेवों ने
अपनी क़ुरबानी दी थी?गर्व किन्तु भारी मन से उन
महान आत्माओं को याद करते हुए..२३ मार्च,२०११)
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