सुबह की हवेली में
किरणों का सन्नाटा-
सुख-दुःख के पल-छिन,
यह न पूछो हमने
किस-किस से बांटा...
छिन गयी हाथों से
समय की जागीर,
सपनों के हाथ जड़ी
व्यथा की ज़ंजीर
उनको सुख फूलों के,
और हमें
दर्द भरा कांटा...
आँखों के तीर पर
आंसुओं के ताल,
सुधियों की बैठकें
मन का चौपाल
दर्द हुआ पाहुन सा,
मौसम की बेटियां
दिखलातीं चांटा...
अपनों की भीड़ में
झूटे सब दांव,
अनचाही राहों पर
बोझिल हैं पांव
दुविधा में डूबा मन,
दिन का मुनीम सिर्फ़
दिखलाता घाटा...
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
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