Friday, May 6, 2011

प्यास के चीत्कार...

पहाड़ जैसे दिनों से

निकलती थी जो

रातों जैसी गहरी नदी-

खो गयी है

यहीं कहीं

इस रेतीले विस्तार में...


समय के पंखों से

बनती थीं जो

सपनों जैसी

उड़ानों की आकृतियाँ-

दम तोड़ गयी हैं

इसी छद्मवेशी आकाश की

अतल गहराइयों में...


टिटिहरी की

दर्द भरी आवाज़ से

बिखरते थे जो

प्यास के चीत्कार-

लहरों तक आते-आते

गुम हो गए हैं

अतृप्ति की

कंदराओं में...


प्यार और स्नेह से

भरपूर लहराता हुआ

आकाँक्षाओं का महासागर-

भूल गया है

अपनी मर्यादाओं का सत्य

आशंकाओं से भरे

रोजी-रोटी के समीकरण

वाले शहर में...


(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

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