पहाड़ जैसे दिनों से
निकलती थी जो
रातों जैसी गहरी नदी-
खो गयी है
यहीं कहीं
इस रेतीले विस्तार में...
समय के पंखों से
बनती थीं जो
सपनों जैसी
उड़ानों की आकृतियाँ-
दम तोड़ गयी हैं
इसी छद्मवेशी आकाश की
अतल गहराइयों में...
टिटिहरी की
दर्द भरी आवाज़ से
बिखरते थे जो
प्यास के चीत्कार-
लहरों तक आते-आते
गुम हो गए हैं
अतृप्ति की
कंदराओं में...
प्यार और स्नेह से
भरपूर लहराता हुआ
आकाँक्षाओं का महासागर-
भूल गया है
अपनी मर्यादाओं का सत्य
आशंकाओं से भरे
रोजी-रोटी के समीकरण
वाले शहर में...
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
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