Friday, May 6, 2011

ज़िन्दगी,तू निराला के छंद सी...

फूल और काँटों के सम्बन्ध-सी

ज़िन्दगी,तू निराला के छंद-सी


बंधनों के ज़हर में खोई हुई

ह्रदय से दर्द का अनुबंध-सी


विवशता के द्वीप में याचक बनी

गहन तम में रोशनी के गंध-सी


प्रारब्ध की रक्तरंजित लेखनी से

आत्मा पर व्यथा के निबंध-सी


बंदिशों की क़ैद में पीड़ा लिए

समय पर सुधियों की धुंध-सी


भटकनों की आग में तपती रही

मरुस्थल में प्यास के तटबंध-सी


भवना की शांत सुप्त घाटियों में

डूबकर ही मुक्ति के प्रबंध-सी

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

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