हमारा समूचा व्यक्तित्व
सिमटकर रह गया है
हमारे द्वारा प्रेषित
SMS में..
हम अब अपने ही व्यक्तित्व के
हकदार नहीं रह गए हैं,
हमारा प्रतिनिधित्व करते हैं अब
हमारे द्वारा भेजे गए SMS ..
आपसी व्यवहार एवं शिष्टाचार में
हम एक दूसरे से मुंह चुराने लगे हैं,
खुशियों का आदान-प्रदान महज एक
औपचारिकता भर रह गया है..
संवेदनाओं या शुभकामनाओं के
आदान-प्रदान की सुपारी
दे दी है हमने SMS को,
और अब सरेआम हत्या हो रही है
शिष्टाचारों की,आचार-व्यवहार की..
किसी के गहन दुःख में भी
नहीं रोती हैं हमारी संवेदनाएं,
बल्कि रोते हैं भेजे गए
SMS के मनगढ़ंत बनावटी शब्द..
आपसी खुशियों में हम नहीं बल्कि
हमारा SMS शरीक होता है ,
और भावनाओं के आदान-प्रदान में
हम ह्रदय की शाश्वत
संवेदनाओं की जगह
अपनी बुद्धि के द्वारा रचते हैं
शब्दों का छल महारत के साथ..
शिष्टाचार अब कैद है
शब्दों की औपचारिकता में,
अपनी अभिव्यक्ति का सारा कॉपीराइट
दे दिया है हमने SMS को..
और हम हम नहीं रह गए हैं,
बल्कि खुद एक SMS हो गए हैं..
और इस प्रक्रिया में-
हम भावनाओं से हीन,
संवेदनाओं से नितांत रिक्त
महज एक ठूंठ रह गए हैं..
(२४-०३-२०१०)
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