ज़िंदगी पर कहर बरपा करते लोग
नफ़रतों का ज़हर देखो भरते लोग
हर तरफ फैला सियासत का धुआं
शासन के चीरों को कैसे हरते लोग
दर्द लिए हर चेहरा बेहद खौफज़दा
इसीलिए ख़ुशियों से शायद डरते लोग
भूख लगे तो अपनी प्यास बुझा लेते
बाहर ज़िंदा पर भीतर से मरते लोग
हमें सलीबों का मतलब समझाने को
लाशों के ऊपर लाशों को धरते लोग
(श्र.कु.उर्मलिया तिवारी)
(३०/०३/२०११ को गंगटोक से लौटते हुए)
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