कैसे खींचा है ,देखो ये लकीर-सा दिन
भटक रहा है जैसे, किसी फ़कीर-सा दिन
ये न हिन्दू न सिर्फ़ मुसलमानों का
हर कोई चाहता है यहाँ कबीर-सा दिन
निकल तो आये हैं हम घर से लेकिन
घर के बाहर भी है इक जंजीर-सा दिन
हर तरफ हो गयी है भीड़ इश्तिहारों की
हमने भी छांट लिया है इक तस्वीर-सा दिन
हो गए हैं क़ैद हम विरह की हवेली में
कैसे काटेंगे भला दर्द की जागीर-सा दिन
अब न कोई लक्ष्य ही बाकी यहाँ पर
फिर भी अर्जुन चाहता है तीर-सा दिन
लाख पत्थर सहे हैं उसने इस ज़माने के
कैसी वहशत कि उसे चाहिए हीर-सा दिन
हम जिए प्यास लिए दूर बियाबानों में
दिल को चुभता रहा कहीं कश्मीर-सा दिन
कब भला शाम ढले और हम तुमसे मिलें
खिंच रहा देखो भला,द्रौपदी के चीर-सा दिन
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
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