Monday, May 16, 2011

कैसे काटेंगे भला दर्द की जागीर-सा दिन...

कैसे खींचा है ,देखो ये लकीर-सा दिन

भटक रहा है जैसे, किसी फ़कीर-सा दिन



ये न हिन्दू न सिर्फ़ मुसलमानों का

हर कोई चाहता है यहाँ कबीर-सा दिन



निकल तो आये हैं हम घर से लेकिन

घर के बाहर भी है इक जंजीर-सा दिन



हर तरफ हो गयी है भीड़ इश्तिहारों की

हमने भी छांट लिया है इक तस्वीर-सा दिन



हो गए हैं क़ैद हम विरह की हवेली में

कैसे काटेंगे भला दर्द की जागीर-सा दिन



अब न कोई लक्ष्य ही बाकी यहाँ पर

फिर भी अर्जुन चाहता है तीर-सा दिन



लाख पत्थर सहे हैं उसने इस ज़माने के

कैसी वहशत कि उसे चाहिए हीर-सा दिन



हम जिए प्यास लिए दूर बियाबानों में

दिल को चुभता रहा कहीं कश्मीर-सा दिन



कब भला शाम ढले और हम तुमसे मिलें

खिंच रहा देखो भला,द्रौपदी के चीर-सा दिन



(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

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