कितनी मुस्तैद हो गयी है अब हमारी सरकार
कि हर चेहरा है यहाँ पर दर्द का इश्तेहार
हर तरफ फैली चुनावी तिकड़में-नारेबाजियां
सियासत भी है अब महज एक कारोबार
इस कदर हालात बदतर औ बेकाबू हुए
क्या किसी को भी है यहाँ कोई सरोकार
गाँधी-नेहरु-तिलक ने सींचा इस धरती को
भ्रष्टाचार यहाँ का अब सबसे अहम् त्यौहार
कुछ न कुछ तो अब करना है मेरे दोस्तों
पर लाएं कहाँ से एक नहीं अन्ना हजार
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
०८/०४/२०११
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