बेखुदी अपनी कुछ बेमानी लगती है
जिंदगी और भी पुरानी लगती है
ख़्वाब-दर-ख़्वाब आदमी के लिए
लम्हे-लम्हे की कहानी लगती है
फिर उजालों की फसल होगी यहाँ
हमको यह सोचकर हैरानी लगती है
उनको देखा तो दिल उदास हुआ
उनकी सूरत बहुत पहचानी लगती है
भुनकर खा रहे हैं मांस सभी
भूख इनकी कुछ जिस्मानी लगती है
दर्द कश्ती है और दुनिया की नदी
ऐसे में रात हर तूफानी लगती है
तू नहीं होती है जब पास मेरे
कोई किस्मत की बेईमानी लगती है
(०३ दिसंबर,१९७८)
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