Saturday, May 7, 2011

कितनी खामोश और रंगीन है शाम..

कितनी ख़ामोश और रंगीन है शाम

रुई के फाहों सी महीन है शाम


कल के वायदे का ऐतबार नहीं

आज के वास्ते यकीन है शाम


ऐसे मौसम में क्यों अकेले हुए

आपकी ख़ातिर तौहीन है शाम


हमने अक्सर इसे चखकर देखा

खट्टी- मीठी नहीं,नमकीन है शाम


इतना ख़ुश होके कोई क्या समझे

हाय! किस दर्द से ग़मगीन है शाम


काश! मेरे पास इक आईना होता

तुमसे कहता,तुमसे हसीन है शाम


फ़लक से उतरेगा अंधेरों का हुज़ूम

रात के वास्ते इक ज़मीन है शाम

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