जब शरीर को नंगा कर
रोशनी स्वयं नंगी हो जाती है;
तब-गाँधी टोपी में क़ैद
तस्वीर को भगवान मानकर,
फूलमालाओं के बंधन
रचते हैं बंदिशों के संविधान-
छल-कपट के कापालिक
अपनी आँखों में ले भीख के कटोरे
याचक बनकर आते हैं
झोपड़ों के द्वार पर;
और सौंप देती है ज़िंदगी
अपने दुखों का कवच,
जो हर महाभारत में उसे
सुखों से बचाता रहा है-
संविधान के पहाड़ ठहाके लगाते हैं;
हर आदमी सरकारी क़ीमत पर
अपनी मौत ढोता है,और
विषधरों के बीच घिरे चंदनवन
का हर दरख़्त
लालफीताशाही की शर्तों पर
रोता है-
कब तक कटते रहेंगे
एकलव्यों के अंगूठे और
कब तक खड़ी रहेंगी
अर्जुन से वीर
पर कर्ण-सी संताने-
सूतपुत्रों की क़तार में?
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
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