Saturday, May 7, 2011

मुझे तुम्हारे बंधन प्रिय हैं...

मुझे तुम्हारे बंधन प्रिय हैं

क्योंकि तुम मुझे

जितना ही बांधना चाहती हो

उतना ही मैं स्वतंत्र होता जाता हूँ.




तुम्हारे आंसुओं का मैं

उपासक हूँ,क्योंकि उनसे

पहचान पाता हूँ अपनी अपवित्रता,

और सीख पाता हूँ हँसना;

खुश रहना.




तुम्हारी मुक्त खिलखिलाहटों से

प्रेरणा लेकर ही मैं

कई-कई बार रो सका हूँ;

सच्चे आंसू.




तुम्हारी रहस्यमयी ख़ामोशी ने

सुझाये हैं जीवन के रहस्य

और मेरे प्रति तुम्हारी

अगाध श्रद्धा ने ही

बना दिया है मुझे तुम्हारे प्रति

लापरवाह एवं श्रद्धाहीन.




तुमने तो शायद

मधुर मिलन का विश्वास

संजोया था मन में..

बिछड़ गया हूँ इसीलिए

मैं तुमसे आखिर.




(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

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