Tuesday, May 17, 2011

जिंदगी अब दर्द की जागीर है..,

जिंदगी अब दर्द की जागीर है
टूटी-बिखरी हाथ की लकीर है

ज़माना है और उसकी जिल्लतें
इन दिनों ये वक़्त भी बेपीर है

हर तरफ हैं भटकनों की रंजिशें
किस्मतों का फैसला आखीर है

पास अपने उलझनें ही उलझनें
हम भी यारो,बहुत ही अमीर हैं

है वही दुनिया की झूठी रौनकें
इन फरेबों की यही तासीर है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

1 comment:

  1. aapne bhi blog bana liyaa , achchha kiyaa. man ki baton ko abhiykt karane ka sahi madhyam hai yah. rachanatmakta bhi barhatee hai. shubhkamanae.

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