Friday, December 30, 2011

मेरी आँखों में सुधियाँ हैं,तुम्हारी आँखों में सपने-

(एक)
सैकड़ों की खिलखिलाहटों में
मैंने उस हंसी को पहचान लिया
जो तुम्हारी थी--
हजारों की ख़ामोशियों में भी
मैंने उस ख़ामोशी को सुन लिया
जो तुम्हारी थी--
लाखों की भीड़ में देख लिया मैंने
तुम्हारी आँखों में झिलमिलाते
चरागों को--
जाने क्यों एक की भीड़ में
तुम मुझे नहीं पहचान सकी,
नहीं जान सकी...

(दो)
मेरी आँखों में सुधियाँ हैं,
तुम्हारी आँखों में सपने-
और इन आँखों के बीच
खड़े हैं,
चुप्पी के विन्ध्याचल
और मुट्ठियों में
खँडहर होता हुआ
हिमालय...

(तीन)
मैं तुम्हे मिल नहीं पाता
यह मेरा ही संविधान है,
और तुम मुझे छोड़ना नहीं चाहते
यह तुम्हारी मर्यादा है--
एक की हार-जीत में

दूसरे की जीत-हार है

***श्रवण***

Thursday, December 29, 2011

बहार को तरस रहे,एक पतझर की तरह...

(एक)
टूटा है अपना दिल भी अपने घर की तरह
जी रहे हैं हम बयाबां में खँडहर की तरह
अपना चमन,वो आशियाँ,जाने किधर गए
बहार को तरस रहे,एक पतझर की तरह

(दो)
हर रात तलाशती अपने लिए सहर
हर मंजिल पे शुरू होता नया सफ़र
ज़िंदगी को ज़िंदा रखना है मुनासिब
ताकि कोई उम्र कहीं यूँ न जाये ठहर

(तीन)
बर्फ के शहर में यह उम्र पिघलने लगी
ज़िंदगी फिर बैसाखियों पर चलने लगी
हो गया अँधेरा जब मन के जंगलों में
दिल की शमां अपने आप जलने लगी

***श्रवण***

Wednesday, December 28, 2011

अपनी ज़िंदगी भी आजकल...

(एक)
ख़ाली वक़्त में यूँ चुपचाप
बैठना नहीं अच्छा,
हुज़ूर!शिकार कीजिये कि
दिल हमारे पास है
और
तीर आपके पास...

(दो)
अपने घर से उसने हमें
लौटाया बार-बार,
हर बार यह कहकर
कि अभी जाइये,
फिर आइयेगा
हम करेंगे इंतज़ार..

(तीन)
जहाँ उन आँखों में
सुधियाँ बहुत गहरी हुई होंगी,
अपनी ज़िंदगी भी आजकल
वहीँ ठहरी हुई होगी...

***श्रवण***

Tuesday, December 27, 2011

वीरानियाँ चीख़ती हैं खामोशियों की भाषा में...

(एक)
पेड़ चुप हैं,रात ख़ामोश
लोग सब गहरी नींद के
आगोश में हैं,
सिर्फ़ चीख़ रहाहूँ मैं
अपनी कलम से लगातार
काग़ज पर..

(दो)
बहुत दिनों के बाद वह मिली
खिलखिलाती हुई,
चहरे पर ख़ुशियों के
सौ-सौ दीप जलाये-
पर तस्वीर में...

(तीन)
वीरानियाँ चीख़ती हैं
खामोशियों की भाषा में
और मैं सुनता हूँ तुम्हे
आत्मा के कानों से..

***श्रवण***

Monday, December 26, 2011

देखना है अबकी आदमी कहाँ से टूटता है...

(एक)
जब भी तेरी गली से मैं बेअख्तियार गुज़रा
ऐ दोस्त! क्यों ये तुझ पे बहुत नागवार गुज़रा
रही दिल में ये तमन्ना,कोई हाल-ए-दिल सुन ले
पर ऐसी बदनसीबी,न कोई गमगुसार गुजरा

(दो)
देखना है अबकी आदमी कहाँ से टूटता है
प्यास का सहारा आखिर कहाँ छूटता है
कितने आराम से होता था सफ़र साथ-साथ
अब तो यहाँ आदमी आदमी को लूटता है

(तीन)
ये ज़िन्दगी की शाम सिर्फ़ शाम ही तो है
सुधियों में कई नाम सिर्फ़ नाम ही तो हैं
तमाम उम्र वो नाराज़ रहे किस ख़ता पर
इस उम्र में मुहब्बत अब इंतकाम ही तो है

***श्रवण***

Sunday, December 25, 2011

हमने फूलों से ज़ख्म खाए हैं...

(एक)
अब दुआओं में असर बाकी नहीं
हादसों से कोई घर बाकी नहीं
घिर गई है ज़िंदगी इस शहर में
मौत का कोई भी डर बाकी नहीं...

(दो)
ऐसा भी ज़िंदगी में हुआ है कभी-कभी
फूलों को हमने हाथ से छुआ कभी-कभी
ये तेरी बात नहीं,जिक्र है ज़माने का
लोगों ने हमें दी है दुआ भी कभी-कभी

(तीन)
हमने फूलों से ज़ख्म खाए हैं
और काँटों से घर सजाये हैं
रोशनी हो उनके घर,इसके लिए
अपने अरमानों को जलाये हैं...

***श्रवण***

Saturday, December 24, 2011

कुछ कहते हैं ये भाव...

(१)

भोरे कुहकी कोयल रानी
कैसी मीठी तान,
आज छुआ मन के अधरों ने
कोई मीठा पान....

(२)
खुले बाल लेकर पुरवैया
चढ़ी नीम की डार,
दोपहर बाद भरा यौवन
तो लाँघ गयी दीवार...

(३)
चितवन में आशा की झिलमिल
चेहरे पर खुशियों का हास,
बाँहों की आतुरता कहती
बंधन का छू लें आकाश...

***श्रवण***

Sunday, December 18, 2011

सामने का द्वार चलो,एक बार खोलें...

बहुत बदनाम हुए घर के पिछवाड़े
सामने का द्वार चलो,एक बार खोलें

वर्षों से जमा है मौन इस आंगन में
प्यार भरे मीठे-मीठे, दो बोल बोलें

नींद नहीं आती रात भर अकेले में
तुम्हारे पहलू में थोड़ी देर सो लें

मीलों तक बियाबान और हम अकेले
चलो किसी राही के साथ ही हो लें

आने वाले दिनों को खूब गुदगुदाएँ
विगत सन्दर्भों के अर्थ क्यों टटोलें

***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Thursday, December 15, 2011

पानी की कीमत जाकर उन रेगिस्तानों से पूछो...

मेरी प्यास घनी कितनी, मेरे अरमानों से पूछो
पानी की कीमत जाकर उन रेगिस्तानों से पूछो

मन की धरती पर प्यासा था एक समंदर
मेरी चाहत की गहराई,मेरे बयानों से पूछो

शमां के जलने को त्याग समझाने वालो
जलने की चाहत को अब परवानों से पूछो

हर आंगन में क्षत-विक्षत हैं रिश्तों के ढेर
पीड़ा रहने वालों की सभी मकानों से पूछो

रोजी-रोटी को निगला यूँ नारों-हड़तालों ने
आम आदमी की पीड़ा कारखानों से पूछो

इस होटल में कैसे-कैसे गुल खिलते हैं
सलाम ठोंकने वाले उन दरवानों से पूछो

मत पूछो किसने कतरे नाज़ुक पंख हमारे
हमारी उपलब्धियों को हमारी उड़ानों से पूछो

बंदिश थी,कहना था जो कुछ,कह न पाए
शब्दों की तनहाई को मेरे तरानों से पूछो

रहे ज़मीनों पर क्यों,हम ऊपर उठ न पाए
इसका कारण भी तुम उन्ही मचानों से पूछो

***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Sunday, December 11, 2011

तुम पे था ऐतबार,उन वादों का क्या हुआ...

तुम पे था ऐतबार,उन वादों का क्या हुआ
हिमालय से भी ऊँचे उन इरादों का क्या हुआ
चारो तरफ थे इश्क के आसार फिजाओं में
बुलबुल ये पूछती है की सयादों का क्या हुआ

***श्रवण***

Saturday, December 10, 2011

जो भी इस जिंदगी में हालात के मारे मिले...

जो भी इस जिंदगी में हालात के मारे मिले
उन्ही लोगों में हमें बेसहारों के सहारे मिले

जिसने भी प्यार का इज़हार किया है खुलकर
उनकी आँखों में जो भी सपने थे, कुंवारे मिले

वो जिन्हें छू सकी न परछाइयों की बाजीगरी
ऐसे ख़ुद्दार कड़ी धूप में जीवन को संवारे मिले

वो जो फ़रयाद की कोशिश में जुटे हैं हर पल
उन्हें तसल्लियों के फिर से कुछ शरारे मिले

हमने हर लफ्ज़ को न जाने कितनी बार पढ़ा
जितने भी मुफ़लिसी में ख़त हमें तुम्हारे मिले

***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Friday, December 9, 2011

अब तो बस प्यार बाकी रहा अफ़सानों में...

ज़िस्म तो रह रहे हैं शहर के मकानों में
क्यूँ रूहें भटकती हैं यूँ दूर बियाबानों में

ज़िस्म तन्हां हैं और रूहें बहुत प्यासी हैं
अब तो बस प्यार बाकी रहा अफ़सानों में

दर्द के दावे मिले हमको विरासत में यहाँ
नाम शामिल हो गया अपना भी परवानों में

बढ़ गयी है बेरुखी,बढ़ने लगे हैं फासले भी
चलके अब ढूंढें कोई उन पुरानी पहचानों में

हर तरफ चेहरों की रंगत देखकर लगने लगा
क़ैद हैं रूहें यहाँ पर ज़िस्म के तहखानों में

***श्रवण***

Thursday, December 8, 2011

ये मेरी प्यास ...

दिल का जो द्वार तुमने खोल दिया है फिर से
ये मेरी प्यास दौड़ कर तेरे पास चली जाती है

***श्रवण***

Friday, December 2, 2011

सफ़र हो रोशनी में...

अंधेरों में चलोगे,कहाँ किसका साथ पाओगे
सफ़र हो रोशनी में तब तो साया साथ होगा

***श्रवण***

सन्नाटा जब बहुत गहरा हो जाता है....

सन्नाटा जब बहुत गहरा हो जाता है,
आसपास का हर चेहरा बहरा हो जाता है,
मूक पर्वत के सामने चिल्लाता हूँ ऊबकर,
अपना नाम लेकर--
अपनी ही आवाज़ सुनने के लिए...

***श्रवण***

Thursday, December 1, 2011

क्या यही उपलब्धियां हम कमाए हैं? ...

हमने वीरानियों के गाँव बसाये हैं
तभी हम पर बियाबानों के साये हैं
प्रगति और विकास की भागदौड़ में
क्या यही उपलब्धियां हम कमाए हैं?

***श्रवण***

Tuesday, November 29, 2011

सुबह का इंतज़ार ज्यों-ज्यों बढ़ा...

सुबह का इंतज़ार ज्यों-ज्यों बढ़ा
रात का विस्तार भी त्यों-त्यों बढ़ा

उम्र का अधिकार ज्यों-ज्यों बढ़ा
व्यथा का आकार भी त्यों-त्यों बढ़ा

समय का प्रतिकार ज्यों-ज्यों बढ़ा
विरह का संसार भी त्यों-त्यों बढ़ा

पीर का उपचार ज्यों-ज्यों बढ़ा
दर्द का अम्बार भी त्यों-त्यों बढ़ा

***श्रवण***

Sunday, November 27, 2011

मेरे इस शहर का भी मिज़ाज बदल जायेगा...

तेरी आँखों में जो सपनो का घर बसाएगा
तेरी मुस्कान में वो बहारों का पता पायेगा
जब भी देखेगी तू इस ओर मेहरबां होकर
मेरे इस शहर का भी मिज़ाज बदल जायेगा

***श्रवण***

Friday, November 25, 2011

बचा लो प्यार के जज्बात,काम आएंगे...

बचा लो प्यार के जज्बात,काम आएंगे
कभी तनहाइयों में ये तुम्हे सहलायेंगे

बहुत परछाइयों पर ऐतबार मत करना
यही कमज़ोर लम्हे दिल को यूँ तड़पाएंगे

जलो गर जल सको तुम रोशनी बनकर
कि सपने ज़िंदगी को गले से लगायेंगे

***श्रवण***

Thursday, November 24, 2011

कभी किसी का तुम इंतज़ार मत बनना...

कभी किसी का तुम इंतज़ार मत बनना
कभी किसी के लिए बेकरार मत बनना

बहुत आसां नहीं है ये ज़िन्दगी का सफ़र
बस इतना याद रहे,गुनहगार मत बनना

***श्रवण***

Wednesday, November 23, 2011

मायूस आशिकों का यतीमखाना था...

कुछ तो पीने का भी बहाना था
कुछ इस दिल को भी बहलाना था

एक साकी हज़ार मयकश थे जहाँ
मायूस आशिकों का यतीमखाना था

मिली शराब भी रंजो-गम के साथ-साथ
बहुत दिनों से खाली मेरा पैमाना था

***श्रवण***

Tuesday, November 22, 2011

संध्या का झुटपुट,बगिया का कोना...

संध्या का झुटपुट,बगिया का कोना...
लगता है कितना अच्छा
तेरी-मेरी बातों का
अर्थहीन होना...

***श्रवण***

Sunday, November 20, 2011

खून की पहचान...

आँखों से जो बहता है उसे तुम अश्क कहते हो
अभी हासिल नहीं है खून की पहचान तुमको

***श्रवण***

Tuesday, November 1, 2011

जितनी बड़ी रस्में,उतने घायल रिश्ते हैं...

किसी भी बात पर हम देर तलक हँसते हैं
छोटे-बड़े घाव अपने इसी तरह रिसते हैं

अपनी वासनाओं के अँधेरे में भटके हुए
हव्वा नहीं,हम तो आदम के फ़रिश्ते हैं

रस्मों और रिश्तों के आईने में झांकिए
जितनी बड़ी रस्में,उतने घायल रिश्ते हैं

बेड़ियों में कसे दो हाथ मुक्ति चाहते हैं
जितना ही चीखिये,उतना ही ये कसते हैं

रह रहे हैं एक वीराने शहर में,हम यारो,
आँखों में सुधियों के कई गाँव बसते हैं

***श्रवण*** (१२ दिसम्बर,१९७७)

Wednesday, October 19, 2011

आंसू जो बह जाते है...

आंसू जो बह जाते है
अपना दायित्व निभा देते हैं
शेष आंसू ढूँढते हैं...
दर्द की कोई नई परिभाषा
***श्रवण***

दरिया का रुख जैसे ठहरा हुआ है...

सन्नाटा जब बहुत गहरा हुआ है
सांसों पर बड़ा कड़ा पहरा हुआ है
ये ज़िंदगी लगी है कुछ ऐसी,यारो
दरिया का रुख जैसे ठहरा हुआ है
***श्रवण***

Saturday, October 15, 2011

इस बार बयाबां हैं हम फस्ले-बहार देखकर...

घर से चले थे हम तो वीराने की तलाश में
बेहद घबरा गए हैं यहाँ पर बाज़ार देखकर

बहकी फिजां में घूमना हसरत नहीं रहीअब
यूँ ही निकल पड़े थे कुछ इश्तहार देखकर

शीशे-सा चटखता है अब पत्थरों का सीना
इस बार बयाबां हैं हम फस्ले-बहार देखकर

रूठा हुआ है हर दरख़्त अपने ही साये से
हम हैं उलझन में,अपनों का प्यार देखकर

खून-ए-जिगर न होगा,अब मौत है तसल्ली
हर डाक्टर ख़ामोश है,हम-सा बीमार देखकर
***श्रवण***

Friday, October 14, 2011

मनवा भारी हो रहा,चुभी पराई पीर...

सन्यासी सा मन हुआ,बाँझ हुई हैं बाहें
छोडो बीता जो भी,कुछ अनचाहा चाहें

चटक चांदनी घर-घर,बांटे मीठी खीर
मनवा भारी हो रहा,चुभी पराई पीर

वन-कन्या के लाज से,रक्तिम हुए कपोल
मन हो गया बावरा,जीवन हुआ अमोल

Saturday, October 8, 2011

आग सीने में लिए फिरता हूँ...

आग सीने में लिए फिरता हूँ
मैं समंदर से बहुत डरता हूँ

अच्छे हालात बचा रखने को
मैं यहाँ बार-बार मरता हूँ

वो न आएंगे,मुझे मालूम है
फिर भी यूँ इंतज़ार करता हूँ
+++श्रवण+++

Friday, October 7, 2011

आस्था और विश्वास के साथ...

आस्था और विश्वास के साथ
बाहें फैलाओगे,मेरे मित्र,
तो
यह समूचा आकाश
ख़ुद-ब-ख़ुद उनमें
समां जायेगा....
***श्रवण***

Monday, October 3, 2011

पाया कि अब टूटी पतवार हैं लोग...

ऊपर से तो बेहद ईमानदार हैं लोग
बेईमानी के लेकिन इश्तेहार हैं लोग

कश्ती की दहशत को देखा-समझा
पाया कि अब टूटी पतवार हैं लोग

Sunday, September 25, 2011

जीने की कैसी है मज़बूरी...

कोई भी जाने न पहचाने
बनते हैं जाने भी अनजाने

यारों की बस्ती में आकर
देखा की मिलते हैं बेगाने

जीने की कैसी है मज़बूरी
खुशियों के झूठे क्यों बहाने

आँखों में चुभती है मंहगाई
घर में सुनिए बीबी के ताने

सुधियों के रिश्ते सब हरजाई
बंधन किस्मत में हैं मनमाने

स्याह हैं अपने बहुत अँधेरे
लुट गए शमा के वो खजाने

जबसे रूठी है ज़िंदगी हमसे
कोई भी आया नहीं मनाने
***श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी***

Sunday, September 18, 2011

मैं तुम्हारा हो जाऊंगा..

तुम्हारे वे सारे मधुर स्पर्श
मुझे तुम्हारा होने नहीं देते...
जिस दिन मैं तुम्हारी रूह को
छू लूँगा,
मैं तुम्हारा हो जाऊंगा..
^^^श्रवण^^^ १८/०९/२०११

Thursday, September 15, 2011

यारो,ये कहाँ आ गए हम?

हवा भी नहीं लिखती है अब
वे स्पर्श-भरी चिट्ठियां,
देता नहीं आसमान भी
कभी नीली दुआएं,
दरख़्त सहलाते नहीं
ममताभरी छांव से,
सूरज भी जैसे
चल रहा वैशाखियों पर,
चाँद भी सृजित नहीं करता
वह मायावी संसार,
बस चारो तरफ कंक्रीट
मॉल,होटल और अट्टालिकाएं,
यारो,ये कहाँ आ गए हम?
@@श्रवण@@

Thursday, September 8, 2011

भेड़िये फिर से गुर्राने लगे हैं...

भेड़िये फिर से गुर्राने लगे हैं
देशभक्तों को सताने लगे हैं

जरा सी शांति क्या हुई कि
ये माहौल को भुनाने लगे हैं

ऐसे हालात के मद्देनज़र यूँ
हम आक्रोश को दबाने लगे हैं

आओ खुलकर फिर से वार करें
ये कहाँ अभी ठिकाने लगे हैं?
@@@श्रवण@@@
०७-०९-२०११

Sunday, August 28, 2011

अब हमारे हाथों में वो हमारा संविधान है...

बंदिशों का न कहीं अब कोई नामोनिशान है
यारो,यह इस दौर का एक पुख्ता बयान है

संसद में क़ैद था जो लोकतंत्र के नाम पर
अब हमारे हाथों में वो हमारा संविधान है

आम ने फिर फेर दिया पानी मनसूबों पर
देश के दुश्मनों की बड़ी सांसत में जान है

एकता ने फिर दिखाया है वो अपना हुनर
भेड़ियों के चगुल से देखो छूटी कमान है

@@@@श्रवण@@@@ २८/०८/२०११

Wednesday, August 24, 2011

एकता का यही है अंदाज़...

हर तरफ से उठ रही आवाज़
हो न हो यह जंग का आगाज़

बढ़ रही है भेड़ियों में खलबली
एकता का यही है अंदाज़

हम तेरे कायल हैं,अन्ना मेरे
बहुत छोटा है मगर जांबाज़

@@@shrawan@@@

Tuesday, August 9, 2011

इश्क मांगे है तुमसे इज़हारे-वफ़ा...

जब दिल भी है और जुबान भी है,
फिर ख़ामोशियों की उड़ान क्यों है?
इश्क मांगे है तुमसे इज़हारे-वफ़ा,
शर्मो-हया की ये झूठी शान क्यों है?
@@@श्रवण@@@
०९-०८-२०११

Friday, August 5, 2011

जिनको आदम समझे वो निकले चौपाये..

इंसानों की बस्ती में सब मिले पराये
जिनको आदम समझे वो निकले चौपाये

हम तो ढोते रहे पिटारा इज्ज़त का
इज्ज़तदार बने वे अपनी आन मिटाये

उपदेशों का ज़हर हमारे हिस्से आया
धन-दौलत पर नेता अपनी नज़र गड़ाये

विषधर लिपटे हैं चन्दन की डालों से
और सपेरों ने हैं यहाँ अलख जगाये

आदर्शों की बातें कीं जन प्रतिनिधियों ने
इन्ही पिशाचों ने आखिर विष-वृक्ष लगाये

प्यार कभी देखा था लिखा किताबों में
अब तो ढाई आखर ने सब अर्थ गंवाये

रिश्ते जितने मिले खून के,नाखूनों जैसे
रस्मों के झूटे सब हमने जश्न मनाये

@@श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी@@
(०५ अगस्त,२०११)

Saturday, July 30, 2011

दर्द का सैलाब इधर आठो पहर होता है...

कितना बिखरा हुआ जीवन का सफ़र होता है
गैर के कदमो पे जब अपना ये सर होता है

ये गुलमोहर हैं,इन्हें प्यार से देखे न कोई
अब तो फूलों में भी काँटों का डर होता है

गीत लिखना भी अब ऐसे पत्थरों के लिए
कोरे कागज़ पे बस स्याही का ज़हर होता है

हम नहीं होते हैं जब दोस्तों की महफ़िल में
कितना ख़ामोश और बीमार शहर होता है

रोशनी के वास्ते फिर आग लगाओ कोई
हर अँधेरे के लिए मेरा ही घर होता है

उनके हिस्से में खिली धूप की ख़ुशबू महके
दर्द का सैलाब इधर आठो पहर होता है

अब वहां कोई फ़रियाद को जाया न करें
आजकल गुमशुदा आहों का असर होता है

उनकी चौखट पे हमने बार-बार सर पटका
वो बात और है कि प्यार सिफ़र होता है

गर कभी भेंट हुई अपनी ज़िंदगी से कहीं
हंस के पूछेंगे,कहो-कैसे बसर होता है?

@@श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी@@

Thursday, July 21, 2011

जिंदगी?????

जिंदगी है वायलिन की मातमी धुन
चल यार, कोई और वाद्द्ययंत्र चुन

भीगता है मेरा मन...

बारिश की बूंदों से
भीगती है धरती
भीगते हैं पेड़-पौधे
भीगती हो तुम,
और तुम्हे भीगता देखकर
भीगता है मेरा मन...

मुझमे ज़िंदा है मेरी ये ज़िंदगी यूँ...

क़तरा-क़तरा खुशियाँ हैं भीख-सी
पीर की नदियाँ समय की सीख-सी

मुझमे ज़िंदा है मेरी ये ज़िंदगी यूँ
सन्नाटों में जैसे किसी चीख-सी
श्रवण...२१.०७.2011

Saturday, July 9, 2011

शोला बनती हैं दबी चिनगारियां...(Revised)

हुक्मरां कर बंद ख़ुदमुख्तारियां
शोला बनती हैं दबी चिनगारियां

ख़्वाब दिखलाते रहे ताउम्र हमको
और हम बुनते रहे लाचारियाँ

अब न कोई रास्ते न मंजिलें
ज़िंदगी का बोझ और दुश्वारियां

हैं कहाँ उम्मीद की परछाईयां
छोड़ दीं जब तुमने जिम्मेदारियां

समय रहते सोच बदलो हाकिमों
या भूल जाओ अपनी थानेदारियां

@@@१०-जुलाई-२०११@@@
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

शोला बनने लगी हैं अब चिनगारियां...

हुक्मरानों बंद करो ये ख़ुदमुख्तारियां
शोला बनने लगी हैं अब चिनगारियां

ज़िंदगी का दम यहाँ कैसे भरें हम
हर तरफ फैला दीं तुमने दुश्वारियां

अब न सपनों की यहाँ पर बात छेड़ो
सुलगती हैं हमारे मन में लाचारियाँ

इस वतन को तोड़ने की सोच भी
बहुत भारी पड़ेंगी ये गैरजिम्मेदारियां

समय रहते सोच को बदलो नहीं तो
हम हैं और अब हमारी कारगुजारियां

@@@०९-जुलाई-२०११@@@
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Wednesday, July 6, 2011

भीतर की बातें कह देता,ऐसा उथला चेहरा है...

ये दिल कोई समंदर नहीं,एक तनहा सहरा है
दर्द का बियाबान जैसे सदियों से यहीं ठहरा है

पीड़ा के पर्वत लांघे सब, सपनों के बंजारों ने
समय के सिपाहियों का यूँ बड़ा सख्त पहरा है

चुभते हैं यादों के नश्तर शामों की तनहाई में
सुधियों से रिश्ता ही मन का इतना गहरा है

स्नेह के सन्दर्भ गहरी प्यास ले कर जी रहे
हाले-दिल हम किससे कहें,वो हरजाई बहरा है

रेहन है खुशियों की ख़ुशबू,प्यासे रेगिस्तानों को
भीतर की बातें कह देता,ऐसा उथला चेहरा है

@@@०५-जुलाई-२०११@@@
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Sunday, June 19, 2011

चुभती मन को पीर पराई...

मरने से क्या डरना,भाई
पग-पग पर हैं बसे कसाई

अधिकारों की बात चली है
चल कर छेड़ें एक लड़ाई

संविधान की धाराओं में
हमने अपनी शाख गंवाई

गली-मोहल्ले सुलग रहे हैं
तुमने ही यह आग लगाई

सपनों की ताबीर लिखें पर
चुभती मन को पीर पराई

खिड़की है पर दृश्य नदारद
उन्नति से यह मिली कमाई

सुख ने हमको प्यासा रक्खा
दुःख ने अपनी प्यास बुझाई

चुभते हैं सुधियों के नश्तर
मन के पैरों फटी विमाई

खिलना था फूलों को लेकिन
काँटों ने क्यों बाड़ बिछाई

जिन्दा रहने की कोशिश में
मुर्दों को मिल गई ख़ुदाई

सागर तक न पहुंची नदियाँ
किसने उल्टी गंग बहाई

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Saturday, June 18, 2011

अन्नदाता हरित-क्रांति के सपूतों के नाम

कन्धों पर आकाश उठाये फिरते हैं
हरित-क्रांति के ये सपूत ही मरते हैं

धरती मां की कोख हरी करने वाले
मेहनतकश ये हाथ दुखों से गुजरते हैं

वसुंधरा है अन्नपूर्णा इनके दम से
क्यों ये तिल-तिल यहाँ बिखरते हैं

जीडीपी का भरम इन्ही से कायम है
इनकी ख़ातिर हम झूठा दम भरते हैं

ये ज़िंदा हैं जब तक हम भी ज़िंदा हैं
कर्ज़े इनके फिर क्यों नहीं उतरते हैं

@@स.सु.@@श्र.कु.उ.तिवारी

Friday, June 17, 2011

बोझा दिल पर,कंधे खाली...

बोझा दिल पर,कंधे खाली
हर आदम ख़ुद हुआ सवाली

इस जीवन में इतने बंधन
किस क़ीमत पर मिले बहाली

इस पीढ़ी को क्या दे पाए
खुली हवा में महल ख़याली

पीड़ा थी भूखे बच्चे की
ज़ार-ज़ार क्यों रोई प्याली

अपना दुखड़ा भूल-भाल कर
दूजों का दुःख रोई रुदाली

इतिहासों की बात करें क्या
वर्तमान जब हुआ मवाली

क़र्ज़ भरेगी आने वाली पीढ़ी
हमने हर ली सब हरियाली

ज़िंदा रहने की कोशिश,पर
समय फिरे है लिए दुनाली

सत्ता का दोहन करते हैं
जिनको करना है रखवाली

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी

मन हो या गुलमोहर,पीड़ा की गर्मी से ही दहकता है...

मन हो या गुलमोहर,पीड़ा की गर्मी से ही दहकता है
जो अपने दर्द जज्ब कर ले,वही इन्सान महकता है

सुख-दुःख तो आते-जाते,तासीर मगर उल्टी पाई
दुःख में इन्सान संयमित,सुख में ही बहकता है
...
रिश्ते-नाते,रश्में-बंधन यूँ जीवन भर चलते रहते
कितना भी ठुकराओ,सुधियों का दंश लहकता है

जीवन जैसे एक जुआं हो या बाजी शतरंजों की
शह का मौका मिलते ही,ये शापित मन चहकता है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Thursday, June 16, 2011

एक गरीब विरहिणी की व्यथा-कथा

आषाढ़ के प्रथम दिवस पर एक गरीब विरहिणी
की व्यथा-कथा :-

''अबकी बरसात में जाने यह क्या हुआ
आँखों के साथ सारा का सारा घर चुआ''

Wednesday, June 15, 2011

दिल में इक ख़ुमार-सा है...

दिल में इक ख़ुमार-सा है
जो अनकहे प्यार-सा है

रोज आते हैं वो ख़्वाबों में
समां मौसमे-बहार-सा है

चाँद उतरा है इस झील में
मिलने का इंतज़ार-सा है

हवाओं में यूँ कशिश पाई
जुल्फ़ों से कारोबार-सा है

वो हंसी साथ,वो हंसी बातें
मीठे सपनों से,करार-सा है

ऐसे अंदाज़ से उठी वो नज़र
फिजां में इक गुबार-सा है

हम हैं या उनकी जुस्तजू है
यह नशा ख़ुशगवार-सा है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
१६/०५/२०११

Monday, June 13, 2011

सियासती किरदारों का अंदाज़ वहशियाना है...

सियासती किरदारों का अंदाज़ वहशियाना है
इनका ये रुख सालों से खूब जाना-पहचाना है

रहबरी को भूलकर ख़ुद हो गए हैं राहजन
अपना ये वतन कितना लगता बेगाना है

लूट रहे अस्मिता देखो अपने ही चमन की
जिससे जुड़ा इनका ख़ुद का आबो-दाना है

नोंच कर खा रहे हैं,इंसानी जिस्मों को
इनके जिस्मों में कोई हैवानी ताना-बाना है

चुनकर के आम ने ही बनाया है खास इन्हें
जो इनकी ख़ातिर महज़ इक वोटर पुराना है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Saturday, June 11, 2011

इंक़लाब आने दो...

अब न रोको ख़ुद को,यारो,वो सैलाब आने दो
पैंसठ साल बाद ही सही, इंक़लाब आने दो

मिटाना है यहाँ से सियारों और भेड़ियों को
बस दिन-रात यूँ कुछ ऐसे ही ख़्वाब आने दो

बहुत तड़पाया है हमें सियासती दरिंदों ने
उनके हिस्से में भी कुछ अज़ाब आने दो

सुना तो है कि हुकूमत अब पशोपेश में है
फिर भी ठहरो ज़रा,सरकारी जवाब आने दो

ये तेरा खून है अब तुझको इसी खूं की कसम
मिटा के ख़ुद को आज़ादी पे शवाब आने दो

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Friday, June 10, 2011

जिन्हें रोटी चाहिए,उन्हें तुम नारे देते हो...

जिन्हें रोटी चाहिए,उन्हें तुम नारे देते हो
अरे धूर्तों,इस देश को क्यों मारे देते हो?

लोगों की भूख पर सेंकते हो रोटियां
जले हुए पर नमक के फुहारे देते हो?

जो भी जुड़ा है इस देश की ज़मीन से
उसे ही क्यों भला हमेशा बिसारे देते हो?

वो भला क्या जानें सलीब का मतलब
उनके लिए फांसी के सहारे देते हो ?

लो संभल जाओ, सियासत के गिद्धों,वर्ना
कहोगे क्यों हमारी इज्ज़त उतारे देते हो!

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

डरे-सहमे से हैं यहाँ हालात,हम क्या करें...

डरे-सहमे से हैं यहाँ हालात,हम क्या करें
दर्द से सिसकते हुए दिन-रात,हम क्या करें

इस क़दर इन भेड़ियों की दरिंदगी देखकर
घायल हो रहे इंसानी जज्बात,हम क्या करें

दलीलें बेच दी हैं इन सियासत के दलालों ने
हो गए कमज़र्फ सब बद्जात,हम क्या करें

यहाँ किसका करें विश्वास,किसकी आस हो
मिल रहे आघात पर आघात,हम क्या करें

यहाँ चोरी भी है और उस पर सीनाजोरियां भी
अंधेरों के हाथों में हमारा प्रभात,हम क्या करें

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Monday, June 6, 2011

हम नहीं टूटे

ज़िंदगी की दौड़ में
हम बहुत पीछे छूटे हैं,
हम नहीं टूटे
हमारे ख्वाब टूटे हैं...

रोशनी के हाथों में बेड़ियाँ
अंधेरों ने खोले हैं यातनाघर
जी रहे विषपायी पल-छिन
जीतना है दुविधा का महासमर

क्या खोया-क्या पाया
मत कहो-करम फूटे हैं
प्रायश्चित के पीर-भवन में
हमारे दावे झूटे हैं...

(श्र.कु.उ.तिवारी)

Friday, June 3, 2011

चलो,कोई नया सफ़र ढूंढ़े...

चलो,कोई नया सफ़र ढूंढ़े
हर तरफ है मेरी नज़र,ढूंढ़े

ये शहर हो गया है वीराना
किस तरह हम अपना घर ढूंढ़े

दें अंधेरे को रोशनी के ज़ख्म
या फिर कोई नयी सहर ढूंढ़े

अब भी ज़िंदा हैं मेरे अफ़साने
वक्त मिल जाय तो ज़हर ढूंढ़े

ख़त के आने का इंतज़ार नहीं
फिर भी चलकरके नामावर ढूंढ़े

लम्हा-लम्हा लुटाया यादों को
ऐ ज़िंदगी,तुझे कहाँ-कहाँ ढूंढ़े

जीना है जिन्दादिली का नाम
चलके,यारो,यहां कहीं बसर ढूंढ़े
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)
@@ यह ग़ज़ल 'सारिका' के सितम्बर,१९७७
अंक में छपी थी@@

Monday, May 30, 2011

रेत का संसार हमारे सामने है..

रेत का संसार हमारे सामने है
सूखता घरबार हमारे सामने है

मृत होती हैं मधुर हवाएं देखो
सूना विस्तार हमारे सामने है

अब भी गर हम सम्हले नहीं
मृत्यु का कारोबार हमारे सामने है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

अपनी ही छाया से साथ यहाँ छूटा है...

भरम शहर का मन में जब-तब टूटा है
पूछो न हमको किस-किस ने लूटा है

इस क़दर भागे हम परछाई के पीछे
अपनी ही छाया से साथ यहाँ छूटा है

जिन्दा रहना बोझ हमारे सर पर भारी
घनी धूप में हर दरख़्त हमसे रूठा है

महलों से संवाद बनाने वालो सुन लो
हम झोपड़ों के सर क्या-क्या फूटा है

अब तो सियासत के दावे-वादे पहचानो
सभी नमूनों का इक-इक लफ्ज़ झूठा है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

क़ैद रह गए पीले फूल किताबों में ...

मन की बात मन में ही,हाय रह गयी
वैसे जबान जाने क्या-क्या कह गयी

क़ैद रह गए पीले फूल किताबों में
अपनी काया विरह-वेदना सह गयी

सुधियों की दीवार हमारी थाती थी
रिश्तों की आंधी में देखो ढह गयी
(श्र.कु.उर्मलिया तिवारी)

मेरे शहर का अख़बार...

सनसनीखेज ख़बरों का बेताज बादशाह
मेरे शहर का अख़बार
बहुत लापरवाह हो गया है इन दिनों;
अब यह अजनबी और अविश्वसनीय
समाचारों से आतंकित करता है
मेरे शहर के लोगों को-


न कहीं हत्या के हैरतअंगेज कारनामे,
न कहीं बलात्कारों के सामाजिक समारोह,
अपहरण और डकैती के सांस्कृतिक
कार्यक्रम भी कहीं नहीं,
न कहीं कालाबाजारी न कहीं रिश्वतखोरी,
हिंसा,आतंक और पथराव का
कहीं नामोनिशान ही नहीं-


न जाने क्या हो गया है अख़बार को,
कि छापता है यह अनबूझ पहेली सी ख़बरें:-
हर महकमें में फ़ैल गया है ईमानदारी का ज़हर,
भ्रष्टाचार हफ़्तों से नदारद है शहर से,
अपराधी को सजा मिलती है
और बेगुनाह को न्याय,
न कोई कहीं भूखा है न नंगा,
गरीबी लापता है और
शहर कि लड़कियां तरसती हैं
कि कोई उन्हें छेड़े-


ख़बरों के ज़रिये खुद को बेचनेवाला
मेरे शहर का अख़बार अब
कोई भी नहीं खरीदता,क्योंकि
मेरे शहर के लोग
हत्या,बलात्कार और अपराधों के
स्वाद के आदी हो चुके हैं-


अब यह अख़बार मेरे शहर का
अविश्वसनीय अख़बार हो गया है...

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Sunday, May 22, 2011

झूठे होते ढाई-आखर...

हर तरफ फुफकारते हैं
धूप के विषधर,
फिर भी खिलते हैं
हमारे मन में गुलमोहर...

खो गए हैं हम बियाबानों में-
मन के थर्मामीटर में देखो
चढ़ता है अब पीड़ा का पारा,
कहीं हमको चीरता है
सुधियों का आरा

मरुस्थल की ज़िंदगी है
प्यास का लम्बा सफ़र,
सूख रहे गाँव-गाँव
स्नेह के नदी-पोखर...

समय का सन्यासी बंजारों सा,
अनकहे संवाद लेकर जी रही
आस्था वीरानों में,
आदमी के हक़ दिखते नहीं
आज के संविधानों में

कपट भरे वातायन में
भीतर कुछ है बाहर कुछ,
छलती हैं दुविधाएं पल-छिन
झूठे होते ढाई-आखर...

रोशनी के गीत रेहन हो गए,
सभ्यता के दंश हैं और
भ्रमित भावी पीढ़ियां,
अधोगामी हो रही हैं
नैतिकताओं की सीढ़ियां...

स्नेह के सन्दर्भ पनपे
जग की कटुता पाकर,
सारी बाजी जीती हमने
अपनों को तिल-तिल खोकर...
(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Tuesday, May 17, 2011

जिंदगी अब दर्द की जागीर है..,

जिंदगी अब दर्द की जागीर है
टूटी-बिखरी हाथ की लकीर है

ज़माना है और उसकी जिल्लतें
इन दिनों ये वक़्त भी बेपीर है

हर तरफ हैं भटकनों की रंजिशें
किस्मतों का फैसला आखीर है

पास अपने उलझनें ही उलझनें
हम भी यारो,बहुत ही अमीर हैं

है वही दुनिया की झूठी रौनकें
इन फरेबों की यही तासीर है

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Monday, May 16, 2011

चाहत...

मेरी चाहतों को अपने रु-ब-रु रखना
इस तरह मेरे दिल की आबरू रखना

दिल-ए-नादाँ को ज़रा आराम देना है...

दिल-ए-नादाँ को ज़रा आराम देना है
हमारी चाहतों को इक अंजाम देना है

गिले-शिकवे भी थोड़ा लाज़िमी हैं
ज़माने भर को ये पैगाम देना है
...
जब तू ही तू है मेरी निगाहों में
दिल चुराया, किसे इल्ज़ाम देना है

मिल गयी मंजिल...

वो परेशां है कि प्यार में वो हार गया अपना दिल
कोई बताये इस नादाँ को इसे मिल गयी मंजिल

ज़िंदगी पर कहर बरपा करते लोग...

ज़िंदगी पर कहर बरपा करते लोग

नफ़रतों का ज़हर देखो भरते लोग



हर तरफ फैला सियासत का धुआं

शासन के चीरों को कैसे हरते लोग



दर्द लिए हर चेहरा बेहद खौफज़दा

इसीलिए ख़ुशियों से शायद डरते लोग



भूख लगे तो अपनी प्यास बुझा लेते

बाहर ज़िंदा पर भीतर से मरते लोग



हमें सलीबों का मतलब समझाने को

लाशों के ऊपर लाशों को धरते लोग



(श्र.कु.उर्मलिया तिवारी)



(३०/०३/२०११ को गंगटोक से लौटते हुए)

सियासत भी है अब महज एक कारोबार...

कितनी मुस्तैद हो गयी है अब हमारी सरकार

कि हर चेहरा है यहाँ पर दर्द का इश्तेहार



हर तरफ फैली चुनावी तिकड़में-नारेबाजियां

सियासत भी है अब महज एक कारोबार



इस कदर हालात बदतर औ बेकाबू हुए

क्या किसी को भी है यहाँ कोई सरोकार



गाँधी-नेहरु-तिलक ने सींचा इस धरती को

भ्रष्टाचार यहाँ का अब सबसे अहम् त्यौहार



कुछ न कुछ तो अब करना है मेरे दोस्तों

पर लाएं कहाँ से एक नहीं अन्ना हजार



(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

०८/०४/२०११

विरह के स्पर्श देखो छा रहे पुरवाइयों में...

उनको सुकून मिलता है तनहाइयों में
जो ढूढ़ते हैं जिन्दगी को परछाइयों में

यूँ दर्द का सिजदा किये, तनहा रहे
खो गए हम खुद-ब-खुद गहराइयों में
...
जो कल तलक होते थे अपने राजदार
आज वो शामिल हैं क्यों तमाशाइयों में

अब बेरुख़ी बढ़ने लगी उनकी तरफ़ से
विरह के स्पर्श देखो छा रहे पुरवाइयों में

सांप और सपेरों के देश में,ऐ ज़िंदगी
खो न जाना तू यार की अंगड़ाइयों में

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

वो हंसी ज़ख्म मुझे फिर कहाँ पाएंगे...

दर्द के रिश्ते बहुत दूर बिखर जायेंगे
वो हंसी ज़ख्म मुझे फिर कहाँ पाएंगे
मुझ से बिछड़े हैं बहुत ख़ुश होकर
मैं परेशां,वो मुझे कैसे अब तड़पाएंगे
(श्र.कु.उर्मलिया तिवारी)

झोपड़ों की जुबान...

सुना है कि दीवारों के भी कान होते हैं..
कितना अच्छा होता यदि झोपड़ों की
भी जुबान होती..(श्र.कु.उर्मलिया तिवारी

दृष्टिदान..

वे देते नहीं किसी भूखे को भी
कभी कोई दान,
पर अमर होने के क्रम में
कर रहे हैं मरणोपरांत
दृष्टिदान..

ज़िंदगी से प्यार भी त्यों-त्यों बढ़ा...

उम्र का विस्तार यूँ ज्यों-ज्यों बढ़ा
दर्द का आकार भी त्यों-त्यों बढ़ा
वक़्त के आघात ज्यों गहरे हुए
ज़िंदगी से प्यार भी त्यों-त्यों बढ़ा
(श्र.कु.उर्मलिया तिवारी)

कैसे काटेंगे भला दर्द की जागीर-सा दिन...

कैसे खींचा है ,देखो ये लकीर-सा दिन

भटक रहा है जैसे, किसी फ़कीर-सा दिन



ये न हिन्दू न सिर्फ़ मुसलमानों का

हर कोई चाहता है यहाँ कबीर-सा दिन



निकल तो आये हैं हम घर से लेकिन

घर के बाहर भी है इक जंजीर-सा दिन



हर तरफ हो गयी है भीड़ इश्तिहारों की

हमने भी छांट लिया है इक तस्वीर-सा दिन



हो गए हैं क़ैद हम विरह की हवेली में

कैसे काटेंगे भला दर्द की जागीर-सा दिन



अब न कोई लक्ष्य ही बाकी यहाँ पर

फिर भी अर्जुन चाहता है तीर-सा दिन



लाख पत्थर सहे हैं उसने इस ज़माने के

कैसी वहशत कि उसे चाहिए हीर-सा दिन



हम जिए प्यास लिए दूर बियाबानों में

दिल को चुभता रहा कहीं कश्मीर-सा दिन



कब भला शाम ढले और हम तुमसे मिलें

खिंच रहा देखो भला,द्रौपदी के चीर-सा दिन



(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

Monday, May 9, 2011

मैं सुबह-ओ-शाम घिरा रहता हूँ खुशबू से तेरी...

जो दिल की बात ही न समझे, वो नज़र क्या है
गर बाकी है कहीं कुछ कसर, वो कसर क्या है

मैं सुबह-ओ-शाम घिरा रहता हूँ खुशबू से तेरी
कुछ तो है बात अपने बीच,वो मगर क्या है

कर तो दूँ ज़िंदगी को अपने तेरे नाम,जब चाहूँ
पहले मालूम तो हो, होगा असर,वो असर क्या है

हर सफ़र वीरान थे और मंजिलें ख़ामोश थीं
अब तेरे बगैर कटे कोई सफ़र,वो सफ़र क्या है

मैं हूँ गर रेत सा प्यासा तो है तू इक दरियादिल
जो बुझा पाये मेरी प्यास बता ,वो लहर क्या है

Saturday, May 7, 2011

मुझे तुम्हारे बंधन प्रिय हैं...

मुझे तुम्हारे बंधन प्रिय हैं

क्योंकि तुम मुझे

जितना ही बांधना चाहती हो

उतना ही मैं स्वतंत्र होता जाता हूँ.




तुम्हारे आंसुओं का मैं

उपासक हूँ,क्योंकि उनसे

पहचान पाता हूँ अपनी अपवित्रता,

और सीख पाता हूँ हँसना;

खुश रहना.




तुम्हारी मुक्त खिलखिलाहटों से

प्रेरणा लेकर ही मैं

कई-कई बार रो सका हूँ;

सच्चे आंसू.




तुम्हारी रहस्यमयी ख़ामोशी ने

सुझाये हैं जीवन के रहस्य

और मेरे प्रति तुम्हारी

अगाध श्रद्धा ने ही

बना दिया है मुझे तुम्हारे प्रति

लापरवाह एवं श्रद्धाहीन.




तुमने तो शायद

मधुर मिलन का विश्वास

संजोया था मन में..

बिछड़ गया हूँ इसीलिए

मैं तुमसे आखिर.




(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

दान...

वे देते नहीं किसी भूखे को भी
कभी कोई दान,
पर अमर होने के क्रम में
कर रहे हैं मरणोपरांत
दृष्टिदान..

बेहद ख़ुश रहे हम दर्द का ख़ुमार पाकर...

बेहद ख़ुश रहे हम दर्द का ख़ुमार पाकर
जीते हैं कैसे लोग यहाँ प्यार पाकर


अपना चमन हंसी था,तेरे बगैर हमदम
अब हो गया बयाबां,तुझसे बहार पाकर


रोशन किया है हमने,ख़ुद अपने चरागों को
तुझसे ही अंधेरों की लम्बी क़तार पाकर


चट्टान का पिघलना,वो अश्क बनके बहना
हम आजमा रहे हैं इक ग़मगुसार पाकर


पीरों की दुआओं का मैं एक तनहा आदम
क्यों उनको भी ख़ुशी है मेरा मज़ार पाकर


(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

मां

एक चाभी का गुच्छा

शांति/नम्रता/डांट/फटकार

अविश्वास की कंटीली झाड़ियाँ

ढेर सारे आंसू/आहें

लाल बिंदी/भरी हुई मांग

जिस्मानी रिश्तों के अजगर

ढेर सारे बच्चे/ममता/स्नेह

और एक निकम्मा पति--

उस मां के पास इनके सिवा

और कुछ नहीं था...




सूनी-सूनी आँखों में

भूख की हकीक़त/प्यास के सपने

खिचड़ी बाल/धूल सने पैर

रोना-धोना और

फटे कपड़ों की इज्ज़त--

उस घर में

बच्चों की दौलत थी...




खटिया पर तिलमिलाते

खांसी के दौर

आज के उत्तर/कल के सवाल

धार्मिक किताबें/पुराना चश्मा

सरौता/चुनौटी/तुलसी की माला

जिम्मेदारियों का फैला तालाब

तैर जाने की तमन्ना

डूब जाने का भय--

उस घर का बाप

किनारे खड़ा था...




वह परिवार क़ैद था आंगन में

और मां की डोर से

बांधे हुए था

आंगन को...



(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

जब भी तेरी गली से...

जब भी तेरी गली से मैं बेअख्तियार गुजरा
ए दोस्त,क्यूँ ये तुझपे,बहुत नागवार गुजरा


दिल में थी तमन्ना,कोई हाल-ए-दिल तो सुनता
पर ऐसी बदनसीबी,न कोई ग़मगुसार गुजरा

तू नहीं होती है जब पास मेरे...

बेखुदी अपनी कुछ बेमानी लगती है

जिंदगी और भी पुरानी लगती है


ख़्वाब-दर-ख़्वाब आदमी के लिए

लम्हे-लम्हे की कहानी लगती है


फिर उजालों की फसल होगी यहाँ

हमको यह सोचकर हैरानी लगती है


उनको देखा तो दिल उदास हुआ

उनकी सूरत बहुत पहचानी लगती है


भुनकर खा रहे हैं मांस सभी

भूख इनकी कुछ जिस्मानी लगती है


दर्द कश्ती है और दुनिया की नदी

ऐसे में रात हर तूफानी लगती है


तू नहीं होती है जब पास मेरे

कोई किस्मत की बेईमानी लगती है

(०३ दिसंबर,१९७८)

चीख़ने से कुछ नहीं होता यहाँ..

रोशनी की राह जो रोके खड़े हैं

जिंदगी भर हम उन्ही से लड़े हैं


चाह थी,सब को मौका मिल सके

पर सियासत ने यहाँ ताले जड़े हैं


जिंदगी के ख़्वाब सच्चे हो सकें

हम हैं छोटे इसलिए सपने बड़े हैं


जो बहुत रहते थे अक्सर सुर्ख़ियों में

आज वे सब शर्म से नीचे गड़े हैं


बंधनों के ज़हर में खोये हुए हैं

जितने भी रिश्ते मिले सब सड़े हैं


चढ़ गए हैं मंच पर चमचे यहाँ

और हम सब हाशिए में पड़े हैं


चीख़ने से कुछ नहीं होता यहाँ

फोड़ दो इनको ये चिकने घड़े हैं


(०५/०३/२०११)

कितनी खामोश और रंगीन है शाम..

कितनी ख़ामोश और रंगीन है शाम

रुई के फाहों सी महीन है शाम


कल के वायदे का ऐतबार नहीं

आज के वास्ते यकीन है शाम


ऐसे मौसम में क्यों अकेले हुए

आपकी ख़ातिर तौहीन है शाम


हमने अक्सर इसे चखकर देखा

खट्टी- मीठी नहीं,नमकीन है शाम


इतना ख़ुश होके कोई क्या समझे

हाय! किस दर्द से ग़मगीन है शाम


काश! मेरे पास इक आईना होता

तुमसे कहता,तुमसे हसीन है शाम


फ़लक से उतरेगा अंधेरों का हुज़ूम

रात के वास्ते इक ज़मीन है शाम

यहाँ बेख़ौफ़ हो कर अब मैं काटों से गुज़रता हूँ

यहाँ बेख़ौफ़ हो कर अब मैं काटों से गुज़रता हूँ

तेरी दुनिया में लेकिन बहुत मैं फूलों से डरता हूँ


सुना करता था लोगों से, यहाँ इंसान रहते हैं

मिलते हर जगह जंगल,मैं भीतर से सिहरता हूँ


बड़े क़द के थे जितने लोग,सब हो गए बौने

इधर मैं राजपथ को छोड़,जनपथ पर उतरता हूँ


यहाँ उम्मीद इक सागर से रेगिस्तान बनती है

नहीं मिलती मुझे मंज़िल,मैं ख़्वाबों सा बिखरता हूँ


तेरी ख़ातिर,मेरी ऐ जिंदगी,सोचा बहुत कुछ था

मगर हालात ऐसे है , बहुत अफ़सोस करता हूँ

है चिरप्रतीक्षित वही चांदनी रात...

है चिरप्रतीक्षित वही

चांदनी रात,

झिलमिल तारों से

पूरा व्योम लिखा-

जैसे तेरी-मेरी बात...


है इतनी धवल उजास,

स्वप्नलोक सी दुनिया में

दूर दूर तक सूना सब कुछ

फिर भी कोई पास-


है ये मधुर बयार या

ख़ुशबू की बारात...


नींद नहीं तिरती आँखों में,

मिलन-यामिनी लेकर आई

सघन उड़ानें प्यार-स्नेह की

चाहत की पाखों में-


करते है मनुहार समय से

हो न जल्दी प्रात...


अधरों के आश्वासन अनगिन,

मौन-निमंत्रण नयनों में

कितना अच्छा हो गर

रुक जाएँ पल-छिन-


विजय सुनिश्चित अनुरागों की

अब न होगी मात..


झिलमिल तारों से

पूरा व्योम लिखा

ज्यों तेरी-मेरी बात...


(सुपर मून को समर्पित.. १९/०३/२०११)

Friday, May 6, 2011

आदमी ने छोड़ दी आदमी कि रहगुजर...

कोई तरक़ीब भी होती नहीं है कारगर

हर तरफ बढ़ते ही जाते सांप-अजगर


दर्द का नासूर ले कर जी रहें हैं लोग

क्यों नहीं दिखते कहीं आक्रोश के नश्तर


जिंदगी के बुतों को तोड़ते हैं बुतशिकन

रहनुमां कानून के हो गए ख़ुद सितमगर


हो चुकी है सभ्यता, पुनः एक पाषाणयुग

आदमी ने छोड़ दी आदमी की रहगुज़र


रंजिशों के दौर में मातमों का शोर, यारो

इस चमन का हाल है अब यही मुख़्तसर


*श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी*

(क्या देश के ऐसे हालातों के लिए ही उन त्रिदेवों ने

अपनी क़ुरबानी दी थी?गर्व किन्तु भारी मन से उन

महान आत्माओं को याद करते हुए..२३ मार्च,२०११)

की हर चेहरा है यहाँ पर दर्द का इश्तेहार...

कितनी मुस्तैद हो गयी है अब हमारी सरकार

कि हर चेहरा है यहाँ पर दर्द का इश्तेहार


हर तरफ फैली चुनावी तिकड़में-नारेबाजियां

सियासत भी है अब महज एक कारोबार


इस कदर हालात बदतर औ बेकाबू हुए

क्या किसी को भी है यहाँ कोई सरोकार


गाँधी-नेहरु-तिलक ने सींचा इस धरती को

भ्रष्टाचार यहाँ का अब सबसे अहम् त्यौहार


कुछ न कुछ तो अब करना है मेरे दोस्तों

पर लाएं कहाँ से एक नहीं अन्ना हजार


(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

०८/०४/२०११

प्यास के चीत्कार...

पहाड़ जैसे दिनों से

निकलती थी जो

रातों जैसी गहरी नदी-

खो गयी है

यहीं कहीं

इस रेतीले विस्तार में...


समय के पंखों से

बनती थीं जो

सपनों जैसी

उड़ानों की आकृतियाँ-

दम तोड़ गयी हैं

इसी छद्मवेशी आकाश की

अतल गहराइयों में...


टिटिहरी की

दर्द भरी आवाज़ से

बिखरते थे जो

प्यास के चीत्कार-

लहरों तक आते-आते

गुम हो गए हैं

अतृप्ति की

कंदराओं में...


प्यार और स्नेह से

भरपूर लहराता हुआ

आकाँक्षाओं का महासागर-

भूल गया है

अपनी मर्यादाओं का सत्य

आशंकाओं से भरे

रोजी-रोटी के समीकरण

वाले शहर में...


(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

ज़िन्दगी,तू निराला के छंद सी...

फूल और काँटों के सम्बन्ध-सी

ज़िन्दगी,तू निराला के छंद-सी


बंधनों के ज़हर में खोई हुई

ह्रदय से दर्द का अनुबंध-सी


विवशता के द्वीप में याचक बनी

गहन तम में रोशनी के गंध-सी


प्रारब्ध की रक्तरंजित लेखनी से

आत्मा पर व्यथा के निबंध-सी


बंदिशों की क़ैद में पीड़ा लिए

समय पर सुधियों की धुंध-सी


भटकनों की आग में तपती रही

मरुस्थल में प्यास के तटबंध-सी


भवना की शांत सुप्त घाटियों में

डूबकर ही मुक्ति के प्रबंध-सी

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

दर्द हुआ पाहुन सा...

सुबह की हवेली में

किरणों का सन्नाटा-

सुख-दुःख के पल-छिन,

यह न पूछो हमने

किस-किस से बांटा...


छिन गयी हाथों से

समय की जागीर,

सपनों के हाथ जड़ी

व्यथा की ज़ंजीर


उनको सुख फूलों के,

और हमें

दर्द भरा कांटा...


आँखों के तीर पर

आंसुओं के ताल,

सुधियों की बैठकें

मन का चौपाल


दर्द हुआ पाहुन सा,

मौसम की बेटियां

दिखलातीं चांटा...


अपनों की भीड़ में

झूटे सब दांव,

अनचाही राहों पर

बोझिल हैं पांव


दुविधा में डूबा मन,

दिन का मुनीम सिर्फ़

दिखलाता घाटा...

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

तेरी ऑंखें हैं खूब नाम,सकी!

तेरी ऑंखें हैं ख़ूब नम,साक़ी!

ला पिला दे अपने ग़म,साक़ी!


आज की रात इल्तिजा है मेरी,

टूट जाने दे सब भरम, साक़ी!


हमने देखे है यूँ वीराने कई,

तेरे चेहरे से मगर कम,साक़ी!


तेरी महफ़िल में चिराग़ों के लिए,

हमने भी खायी है क़सम, साक़ी!


अपने क़ाबू में दिल नहीं रहता,

तेरी चाहत में इतना दम,साक़ी!


इश्क़ दरिया है, प्यार की लहरें,

बह गए तेरे साथ हम, साक़ी!


ज़िंदगी इस क़दर है उलझी हुई,

तेरे बालों में जितने ख़म,साक़ी!

लोकतंत्र

जब शरीर को नंगा कर

रोशनी स्वयं नंगी हो जाती है;

तब-गाँधी टोपी में क़ैद

तस्वीर को भगवान मानकर,

फूलमालाओं के बंधन

रचते हैं बंदिशों के संविधान-


छल-कपट के कापालिक

अपनी आँखों में ले भीख के कटोरे

याचक बनकर आते हैं

झोपड़ों के द्वार पर;

और सौंप देती है ज़िंदगी

अपने दुखों का कवच,

जो हर महाभारत में उसे

सुखों से बचाता रहा है-


संविधान के पहाड़ ठहाके लगाते हैं;

हर आदमी सरकारी क़ीमत पर

अपनी मौत ढोता है,और

विषधरों के बीच घिरे चंदनवन

का हर दरख़्त

लालफीताशाही की शर्तों पर

रोता है-


कब तक कटते रहेंगे

एकलव्यों के अंगूठे और

कब तक खड़ी रहेंगी

अर्जुन से वीर

पर कर्ण-सी संताने-

सूतपुत्रों की क़तार में?

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

जाने कहाँ गया वह जंगल...

जाने कहाँ गया वह जंगल,

सागौन और महुए के पेड़ों से

भरा हुआ?


नैतिकताओं की नदियाँ,संस्कारों के नाले

परम्पराओं का निर्वाह करती हवाएं

खुशिओं की मुनादी करते पक्षी-गण

और संयमित जानवर,सुसंस्कृत जीव-जंतु-

न जाने कहाँ गया हमारा

वह प्यारा जंगल?


वे पक्षी,जानवर और जीव-जंतु

प्रकृति के नियमों में बंधे

इंसानों से बहुत ऊपर थे

क्योंकि वे स्वयं पर

नहीं करते थे झूठा गर्व..


न जाने क्या हुआ की जब से

शहरी दास्तान सुन लिया जंगल ने,

अपने आप पर और अपनी

सत्ता से हैरान रह गया है...


बहुत अकेला और वीरान

हो गया है अब जंगल-

चील और गिद्ध शहर जा बसे हैं,

चीतों और भेड़ियों ने

पहन लिया है लोकतंत्र को...


नहीं,जंगल अब नहीं है वहां,

जाकर अब वह भी

बस गया है शहर में..

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

मुझे तुम्हारे बंधन प्रिय हैं...

मुझे तुम्हारे बंधन प्रिय हैं

क्योंकि तुम मुझे

जितना ही बांधना चाहती हो

उतना ही मैं स्वतंत्र होता जाता हूँ.


तुम्हारे आंसुओं का मैं

उपासक हूँ,क्योंकि उनसे

पहचान पाता हूँ अपनी अपवित्रता,

और सीख पाता हूँ हँसना;

खुश रहना.


तुम्हारी मुक्त खिलखिलाहटों से

प्रेरणा लेकर ही मैं

कई-कई बार रो सका हूँ;

सच्चे आंसू.


तुम्हारी रहस्यमयी ख़ामोशी ने

सुझाये हैं जीवन के रहस्य

और मेरे प्रति तुम्हारी

अगाध श्रद्धा ने ही

बना दिया है मुझे तुम्हारे प्रति

लापरवाह एवं श्रद्धाहीन.


तुमने तो शायद

मधुर मिलन का विश्वास

संजोया था मन में..

बिछड़ गया हूँ इसीलिए

मैं तुमसे आखिर.

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

भ्रष्ट हैं अब आचरण, हो रहे हैं जिधर देखो अस्मिता के चीर-हरण!

भ्रष्ट हैं अब आचरण,

हो रहे हैं जिधर देखो

अस्मिता के चीर-हरण!


भ्रष्ट है अब वातावरण,

कौन सिखलाये हमें

लोभ से संवरण?


आस्था ने खो दिए आयाम

सपने टूटें पल-छिन अविराम

मन को छलता है विश्वास

झूठे लगते धरती-आकाश...


कहाँ है आशा की किरण,

जो निर्मल कर दे

अंधकारों के अंतःकरण?


चेहरे जो दिखते फूलों से

चुभते हैं निर्मम शूलों से

उजले जितने भी व्यक्तित्व

हैं बस कालिख के अस्तित्व...


सत्य बन गया कुम्भकरण,

कौन देगा पाप को

पुण्य भरे जागरण?


भ्रष्टाचार की चलें हवाएं

दूषित होती सभी दिशाएं

विषपायी हैं श्रद्धा के स्वर

खोये प्रेम के ढाई आखर...


नागफनी के अंकुरण,

देश के अभयारण्य में

भेड़ियों का विचरण!


जहरीले वातायन का विस्तार

देता अक्रोशों को आकार

नपुंसक होने लगे विरोध

पराजित होने लगे अनुरोध...


मिथ्या राह का अनुसरण,

दंश सहते जी रहे

ज़िंदगी के व्याकरण!


रोशनी जो क्षितिज के पार

मिटाएगी तमस का संसार

हम मिलजुल करें प्रयास

स्थापित हो फिर विश्वास...


भ्रष्ट न पाए कहीं शरण,

तभी होगा अतिशीघ्र

समस्या का निराकरण!

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

तेरी तनहाइयों का गर ज़िम्मेदार हूँ मैं...

तेरी तनहाइयों का गर ज़िम्मेदार हूँ मैं

अब भी आजा कि तेरा इंतज़ार हूँ मैं


दर्द अंगारा बनके हमको रोशनी देगा

तेरे ज़ख्मों से मगर खूब शर्मसार हूँ मैं


तेरे रोने से जो सावन कि घटायें बरसें

दिल से उन अश्कों का गुनहगार हूँ मैं


मन के आंगन में तेरा प्यार गवाही देगा

कैसे बतलाऊं कि अब तेरा क़र्ज़दार हूँ मैं


अपने सपनों में मुझे थोड़ी जगह दे देना

हिस्सा बनना है मुझे तेरा, बेक़रार हूँ मैं

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

हाँ,मैं ज़िंदा हूँ क्योंकि तुम आज भी ज़िंदा हो मेरे भीतर

हाँ,मैं ज़िंदा हूँ

क्योंकि तुम

आज भी ज़िंदा हो

मेरे भीतर

एक लौ की तरह

झिलमिलाती हुई--


हाँ,मैं ज़िंदा हूँ

क्योंकि

मेरे मन की दरकती ज़मीन पर

आज भी बरसाती हो तुम

अपने प्यार-स्नेह की बूंदें

और स्वयं अंकुरित होती हो

जीवन की हरियाली बनकर--


हाँ,मैं ज़िंदा हूँ

क्योंकि

मेरे अंतर्मन में

आज भी गूंजती हो तुम

अपने द्वारा उच्चारित

मधुर शब्द बनकर

और भर देती हो

मेरे भीतर के गहन सन्नाटे को

अपनी गुनगुनाहट से--


हाँ,मैं ज़िंदा हूँ

क्योंकि तुम्हारी पीड़ा-व्यथा

निश-दिन,पल-पल

लिखती रहती है

मेरे अंतस के कागज़ पर

दर्द की इबारतें,

और तुम आंसू बनकर

निरंतर समाहित होती रहती हो

मेरी ह्रदय-सरिता में--


काश!मैं सहला पाता तुम्हारी पीड़ा

अपने अनचाहे स्पर्श से,

या तुम्हे छूकर;

या तुम्हारे हाथों को

अपने हाथों में लेकर;

या संभव होता,तो

तुम्हारे सर को

अपने अभागे कन्धों पर

टिका कर;

दे पाता तुम्हे

थोड़ी सी तसल्ली--

(श्रवण कुमार उर्मलिया तिवारी)

इस शहर में अपनों का गुमां डूब रहा है

इस शहर में अपनों का गुमां डूब रहा है

अब किससे कहें अपना मकां डूब रहा है


हर शाम मेरी आँखों से कहता है ये सूरज

मैं यहाँ डूब रहा हूँ ,तू वहां डूब रहा है


यादों ने ले लिया है मेरी,बाढ़ का रंग-रूप

ऐसे में जाने कौन कहाँ डूब रहा है


मंजिलें हैं, रास्ते हैं, पर सफ़र वीरान हैं

रेत पर क़दमों का निशां डूब रहा है


मुजरिमों के बीच फरयाद का क्या करें

मुखबिरों में अपना बयां डूब रहा है

(१७ फरवरी,१९७८)

मगर अफ़सोस हमको पत्थरों के ये शहर मिले

तमन्ना थी कहीं, जिंदगी, तुझको बसर मिले
मगर अफ़सोस हमको पत्थरों के ये शहर मिले

जहाँ दीवार की मानिंद ढहते जी रहे हैं लोग
उसी बस्ती में अपने काफ़िलों को हमसफ़र मिले

वो अफ़साने,जिन्हें दहलीज़ पर हम छोड़ आये थे
वही फिर आज तनहाई में क्यों मद्देनज़र मिले

इरादों की हवेली में ख़ुशी नासूर बनती है
तकाज़ों को हमारे जब तसल्ली का ज़हर मिले

कहीं पर वारदातें है, कहीं आतंक या पथराव
उठा लो कोई भी अखबार,ऐसी ही ख़बर मिले

शहर हो लाख दिलकश,वो फरेबों का करिश्मा है
करें गर बुतपरस्ती तो दुआओं में असर मिले

पहेली है अँधेरी रात, इसे हल करना ही होगा
करो अब खूं से चरागाँ कि मुकम्मल सहर मिले